इलाहाबाद (ब्यूरो)। हिंदुस्तानी एकेडमी में बृहस्पतिवार को ‘मध्ययुगीन हिंदी में स्त्री चेतना’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई। जिसमें महिला रचनाकारों ने मध्यकाल में मीरा को विशेष संदर्भ में जोड़ते हुए अपनी बात रखी। डॉ. कुसुम सिंह ने कहा कि मध्ययुगीन हिन्दी कविता हमारे साहित्य के इतिहास का स्वर्ण युग है। भक्ति, प्रेम, धर्म, दर्शन एवं आध्यात्म की गौरवशाली परंपरा है। मीराबाई ने स्त्री समाज के लिए गढ़े गए ढांचे को ढाहने को जो साहस उन्होंने किया वह उनके स्वतंत्र चेता भाव बौद्धिक क्षमता और अस्मिता बोध का परिचायक है।
रत्नाकुमारी ने कहा कि मध्यकालीन काव्य में मीराबाई नारी चेतना का प्रभापुंज हैं, जिनके प्रकाश में नारी के संघर्ष को समझा जा सकता है। मीराबाई का काव्य एवं जीवन मध्यकालीन कवियों की मानसिकता सशक्त प्रतिरोध उपस्थित करता है। नारी जीवन का नया पथ खोलता है। डॉ. सरोज सिंह ब्राह्मण, सामंत और शास्त्र मध्ययुगीन तंत्र हैं। स्त्री का लिखना स्वयं में पितृसत्ता का निषेध कहा जा सकता है। प्रो. पुष्पा बरनवाल ने मध्यकाल में नारी भावना और प्रो. सपना चौधरी ने संत काव्य में नारी चेतना विषय पर विचार व्यक्त किए।
एकेडमी कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने कहा कि स्त्री विमर्श स्त्री का स्त्री के द्वारा स्त्री के लिए किया गया विमर्श है। संगोष्ठी का संचालन एकेडमी की प्रकाशन अधिकारी ज्योतिर्मयी ने किया। इस मौके पर प्रो. अमर सिंह, हरिमोहन मालवीय, डॉ. अनुपम आनंद, नंदल हितैषी, विवेक सत्यांशु, प्रदीप तिवारी, डॉ. अनिल सिंह, फाजिल हाशमी, डॉ. वीरेंद्र कुमार तिवारी आदि मौजूद रहे।