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Vat Savitri 2023 : पति के दीर्घायु और मंगल कामना के लिए सुहागिनों ने की वट सावित्री की पूजा, मांगा आशीष

Fri, 19 May 2023 04:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

हिन्दू धर्म में वट सावित्री पूजा को काफी महत्व दिया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि इसी दिन सावित्री ने पति सत्यवान के प्राण आज ही के दिन वट के वृक्ष के नीचे बैठकर बचाया था। व्रत में बरगद के पेड़ का बहुत महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद के वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है।
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वट सावित्री पर पूजन करतीं सुहागिन महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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पति की लंबी उम्र और मंगलमय जीवन के लिए सुहागिन महिलाओं ने वट सावित्री की विधि विधान से पूजा की। व्रत रखकर महिलाओं ने बरगद के वृक्ष की पूजा कर पति और परिवार के सुखमय जीवन की कामना की। मंदिरों पर सुबह से ही काफी भीड़ देखी गई। पूजन का सिलसिला भोर से ही शुरू हो गया था। संगम और गंगा, यमुना में महिलाओं ने डुबकी लगाने के बाद घाटों पर स्थित बरगद के पेड़ के नीचे वट सावित्री की पूजा की। इसके अलावा घरों और शहर के विभिन्न मंदिरों में पूजन के लिए काफी भीड़ देखी गई। सिंदूर, बिंदी, रोली, रक्षा और अन्य सौंदर्य प्रसाधान की सामग्री का अर्पण किया गया।

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हिन्दू धर्म में वट सावित्री पूजा को काफी महत्व दिया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि इसी दिन सावित्री ने पति सत्यवान के प्राण आज ही के दिन वट के वृक्ष के नीचे बैठकर बचाया था। व्रत में बरगद के पेड़ का बहुत महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद के वृक्ष में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। पेड़ की जड़ें ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं। वट वृक्ष का तना विष्णु का प्रतिनिधित्व और भगवान शिव बरगद के पेड़ के ऊपरी हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। पूरा पेड़ सावित्री माना जाता है।

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जानें क्या है महात्म्य
 
ऐसा माना जाता है कि इस पवित्र पेड़ के नीचे पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार जिस तरह सावित्री ने अपने समर्पण से अपने पति सत्यवान को यमराज से वापस लायीं थीं, उसी तरह इस शुभ व्रत को रखने वाली विवाहित महिलाओं को एक सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शुक्रवार को वट सावित्री व्रत था। इस दिन सुबह जल्दी स्नान करने के बाद, विवाहित महिलाएं दुल्हन के रूप में तैयार होकर अपने माथे पर सिंदूर लगाया।
 
इसके बाद भीषण गर्मी व चिलचिलाती धूप में नंगे पाव पूजन सामग्री के साथ बरगद के पेड़ के नीचे गई। इसके बाद विधि विधान से वट वृक्ष की पूजा शुरू की। बरगद के पेड़ को चावल और फूल अर्पित किया।इसके बाद पेड़ के तने के चारों ओर पीले या लाल रंग के धागे बांध कर उस पर  सिंदूर छिड़क कर प्रार्थना करते हुए पेड़ की परिक्रमा की। देवी सावित्री की भी पूजा कर उनकी कथा सुनकर  भोग लगाकर अपने व्रत का पारण किया गया। नई नवेली दुल्हन में इस व्रत को लेकर काफी उत्साह दिखाई दिया।
 
इस दौरान मंदिरो में पूजा करने वाले भक्तो की भीड़ दिखाई दी। प्रयागराज के संगम, बरगद घाट, बलुआ घाट, बड़े हनुमान मंदिर, शिव मंदिर राजरूपपुर, शक्तिपीठ अलोप शंकरी, कल्याणी देवी, ललिता देवी, दारागंज, धूमनगंज, सिविल लाइंस, टैगोरटाउन में मंदिरों के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे पूजा की गई। कौशांबी में गंगा के कड़ा, कुबरी, बजाज, पलहाना, संदीपन, कंकरा बाद, फतेहपुर, बदनपुर आदि घाटों पर स्नानार्थियों की काफी भीड़ दिखाई दी। स्नान के बाद बरगद की पूजा की गई। 
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