रूसी दार्शनिक सोरोवस्की के मुताबिक किसी शहर, स्थान, गली का इतिहास जानना हो तो सबसे पहले उसके नाम के इतिहास के बारे में जानकारी करनी चाहिए। प्रयागराज का पुराना शहर अपने हृदय में मुगलों से लेकर ब्रिटिश हुकूमत तक के इतिहास को समेटे हुए है। कोतवाली के पीछे दायराशाह अजमल और बच्चाजी की कोठी को जोड़ने वाली रानी मंडी की गली भी ऐसे ही इतिहास से रूबरू कराती है। महारानी विक्टोरिया के शासन के आरंभ की याद में इस गली का नाम रानी मंडी गली रखा गया था।
प्रयागराज लंबे समय तक मुगलों और अंग्रेजों के शासन के अधीन रही है। यहां के कई पुराने मुहल्ले मुगलों ने बसाए हैं तो ऐसे भी गली-मुहल्ले हैं, जिन्हें अंग्रजों का नाम दिया गया है। रानीमंडी को भी अंग्रेजों ने बसाया है। पुराने शहर की गलियों और मुहल्लों पर अध्ययन करने वाले नसीम कुरैशी बताते हैं कि रानीमंडी गली को इस शहर के प्रथम अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर आर अहमुटी ने बसाया था।
चूंकि मौजूदा कोतवाली बिल्डिंग ही तत्कालीन प्रशासक का दफ्तर हुआ करती थी। ऐसे में उसके पीछे बसे इलाके को महारानी विक्टोरिया के नाम पर रानी मंडी कहा जाने लगा। यह कोतवाली 1874 में बनाई गई। पुराने इतिहास पर लेखन का काम करने वाली रेनु सिंह बताती हैं कि कोतवाली के पीछे रानीमंडी गली का नामकरण महारानी विक्टोरिया के शासन की शुरुआत के आरंभ की स्मृति में किया गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभुत्व के बाद जब महारानी का शासन शुरू हुआ तब अंग्रेजों ने इस गली को बसाया। उस दौर में बताया जाता है कि रानीमंडी का इलाका एक पठार था। वहीं पास में खुशहाल पर्वत भी था। अब खुशहाल पर्वत एक मुहल्ले के रूप में आबाद है। रानीमंडी गली रोशनबाग ढाल से उतरकर बैगन टोला, कादीजी की मस्जिद, दायराशाह अजमल और दायराशाह मोहम्मदी से होते हुए गोल पार्क को जोड़ती है। इसी गली में शहर के रईस बच्चा जी की कोठी भी है। इसी गली से आगे निकलने पर अतरसुइया आ जाता है। यह संकरी और तंग गली विकास के लिए तरस रही है।