इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध की एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली अर्जी पर मजिस्ट्रेट का पूर्ण विवेकाधिकार है कि वह एफआईआर का आदेश दे या उसे परिवाद के रूप में दर्ज कर साक्ष्य पेश करने का निर्देश दे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध की एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली अर्जी पर मजिस्ट्रेट का पूर्ण विवेकाधिकार है कि वह एफआईआर का आदेश दे या उसे परिवाद के रूप में दर्ज कर साक्ष्य पेश करने का निर्देश दे। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने एम्स गोरखपुर के एमबीबीएस छात्र जितेंद्र भाटी की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।
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अपीलार्थी जितेंद्र भाटी ने आरोप लगाया था कि 27 नवंबर 2024 को एम्स के एक वार्षिक समारोह के दौरान और उसके बाद 30 नवंबर को उसके सहपाठियों ने उसे जातिसूचक गालियां दीं, मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। घटना की शिकायत डीन और हॉस्टल वार्डन से करने के बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो पीड़ित ने विशेष अदालत में बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत अर्जी दाखिल कर एफआईआर दर्ज कराने की मांग की।
विशेष जज गोरखपुर ने 29 जुलाई 2025 के आदेश से एफआईआर के बजाय इसे परिवाद के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया था। अपीलार्थी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न नजीरों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट को यह तय करने का अधिकार है कि मामला पुलिस विवेचना के योग्य है या नहीं।
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यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि शिकायतकर्ता स्वयं साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है तो वह परिवाद की प्रक्रिया अपना सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवाद की सुनवाई के दौरान भी मजिस्ट्रेट के पास पुलिस विवेचना का आदेश देने का अधिकार सुरक्षित रहता है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को विधि सम्मत मानते हुए हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया।