इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के एक परिचालक की बर्खास्तगी को उचित ठहराते हुए स्पष्ट किया है कि बस में यात्रियों को बिना टिकट ले जाना एक गंभीर कदाचार है और ऐसे कर्मचारी को सेवा में बने रहने का हक नहीं है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने याचिकाकर्ता जगदंबा प्रसाद पांडेय की याचिका को खारिज करते दिया है।
न्यायालय ने इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह भी स्पष्ट किया कि अनुशासनिक कार्रवाई के मामलों में हाईकोर्ट तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा, जब तक जांच की प्रक्रिया में कोई बड़ी सांविधानिक चूक न पाई जाए। यह मामला वर्ष 2004 का है, जब अकबरपुर डिपो में तैनात परिचालक जगदंबा प्रसाद पांडेय की बस का फैजाबाद-अकबरपुर मार्ग पर औचक निरीक्षण किया गया था।
चेकिंग के दौरान पाया गया कि बस में 59 यात्री सवार थे, जिनसे परिचालक ने पैसे तो ले लिए थे, लेकिन किसी भी यात्री को टिकट जारी नहीं किया था। इस गंभीर अनियमितता के सामने आने के बाद विभाग ने जांच बैठाते हुए 15 फरवरी 2005 को याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त कर दी थीं। परिचालक ने बर्खास्तगी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि ड्यूटी के दौरान याची के पेट में अचानक तेज दर्द होने लगा था, जिसके कारण वह टिकट वितरित नहीं कर सका। उसने यह भी दावा किया कि निरीक्षण बस के चलने के मात्र 1.5 से दो किलोमीटर के भीतर ही कर लिया गया था।
हालांकि, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने इन दलीलों को खारिज करते हुए पाया कि निरीक्षण स्थल की वास्तविक दूरी अकबरपुर बस स्टेशन से लगभग 12 किलोमीटर थी, जो टिकट काटने के लिए पर्याप्त समय था। कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि यात्रियों को बिना टिकट यात्रा कराना न केवल अनुशासनहीनता है, बल्कि यह निगम के साथ विश्वासघात की श्रेणी में भी आता है। अंततः कोर्ट ने याचिकाकर्ता को किसी भी प्रकार की राहत देने से इन्कार करते हुए बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा।