कई कल्पवासियों को टेंट कनात तक नहीं मिला
वह कहते हैं कि इस बार जैसी गड़बड़ी और उदासीनता कभी भी मेले में सामने नहीं आई थी। इसके पीछे की वजहों की जांच कराई जानी चाहिए, ताकि सचाई सामने आ सके। इसी तरह जगदगुरु घनश्यामाचार्य को भी सुविधा के नाम पर एक टिन घेरा या कनात तक नहीं मिला। मजबूर होकर उन्होंने अपनी जेब से रकम खर्च कर किराये पर टेंट मंगवाकर शिविर लगाया है।
इसी तरह परी अखाड़े की स्वयंभू शंकराचार्य त्रिकाल भवंता लगातार पांच दिन तक मेला कार्यालय पर धरना देकर थक चुकी हैं। उन्हें भी पंडाल, टिन घेरा नहीं मिला। धरना प्रदर्शन के बाद एक नल और कपड़े का शौचालय दिया गया। वह कहती हैं कि आखिर मेले में आने वाली साध्वियां और भक्त कहां और कैसे रहेंगे, इसे लेकर बड़ी हैरानी है। अब वह भक्तों को फोन कर मेले में आने से मना कर रही हैं।
59 करोड़ है माघ मेले का बजट
उनकी चिंता है कि बाहर से लोग आए तो वह ठहराएंगी कहां। माघ मेले में आने वाले संतों, कल्पवासियों को भूमि और सुविधाएं सरकार की ओर से ही दी जाती रही है। पिछले वर्ष के माघ मेले की तरह ही इस बार भी माघ मेले का बजट 59 करोड़ रुपये है। पांटून पुल, चकर्ड प्लेट मार्ग, बिजली, पेयजल के अलावा तंबुओं की नगरी इसी बजट से बसाई जानी थी, लेकिन मेला शुरू होते ही सुविधाओं के नाम पर मिलने वाला बजट कहां गया, इसे लेकर अबसवाल खड़े होने लगे हैं।
सुविधाओं में कटौती कितनी और किन वजहों से की गई है, इसकी जानकारी ली जा रही है। ताकि उचित कदम उठाया जा सके।- अरविंद कुमार चौहान, प्रभारी मेलाधिकारी।