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लाइक्स, कमेंट्स के फेर में बन रहे कोरे रिश्ते, बेमानी दोस्त

Thu, 19 May 2016 01:48 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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ममफोर्डगंज के अभिनव मिश्रा के फेसबुक पर तकरीबन एक हजार दोस्त हैं। इसके बाद भी फ्रेंडशिप रिक्वेस्ट भेजने का सिलसिला जारी है। वह छोटी से छोटी बातों को फेसबुक पर शेयर करते हैं। फोटोज भी ज्यादातर सेल्फी ही अपलोड करते हैं। दोस्तों, परिवार के साथ कभी बाहर जाने का मौका मिला तो उसकी फोटो भी अपलोड कर देते हैं। अभिनव कहते हैं, जितने ज्यादा लाइक्स और कमेंट आते हैं, उतनी ही खुशी मिलती है। अगर ऐसा नहीं होता है तो निराश भी होते हैं।
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यह स्थिति आजकल ज्यादार लोगों की है। फेसबुक समेत दूसरी सोशल साइट्स पर लोगों की फ्रेंड लिस्ट में दोस्तों की भरमार है। 300-400 तो छोड़िए एक हजार से तीन हजार तक दोस्त बना रखे हैं। मकसद सिर्फ ज्यादा से ज्यादा लाइक्स और कमेंट हासिल करना है। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में वह अपने और अपने समाज से दूर होता चला जा रहा है। जिसमें उसके पास न अपने लिए वक्त है, न ही सामाजिक जिंदगी के लिए। अपने आसपास के रिश्तों से वह धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है। ऐसे में जब उसे वक्त मिलता है तो उसी खालीपन को दूर करने के लिए वह सोशल साइट्स का सहारा लेता है। अपनी खुद की ही फोटो अपलोड करके और उसपर लाइक और कमेंट देखकर खुश हो जाता है।

ज्यादातर लोगों को यह पता नहीं होगा कि फेसबुक समेत अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स सिर्फ एक्टिव फॉलोवर्स को ही जोड़े रखती हैं यानी कि भले ही अपने दो हजार दोस्त हो, उसमें से अगर 200 ही आपसे रेगुलर जुड़े हैं तो ही वह आपके संपर्क में रहेंगे। यहां तक कि नोटिफिकेशन भी सिर्फ उन तक ही पहुंचेगी। ऐसे में यहां पर ज्यादा दोस्त बनाने के कोई फायदे नहीं है।
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सोशल साइट्स का प्रयोग पुराने, बिछड़े और पहुंच से दूर दोस्तों के संपर्क में रहने, सामाजिक गतिविधियों समेत दूसरे मुद्दों पर अपनी बात कहलाने का तो अच्छा प्लेटफार्म है लेकिन आजकल स्थिति इसके वितरीत है। सोशल साइट्स में भी लोग आम जीवन की तरह भेड़चाल में शामिल हो रहे हैं। ज्यादातर चीजें अब आत्मकेंद्रित हो गईं हैं। वजह यही कि लोग अपने वास्तविक जीवन से दूर होते जा रहे हैं और अपनी सोशल नीड को पूरा करने के फेर में ढेर सारे दोस्त बना कर खुद को खुश करने के रास्ते तलाश रहे हैं।
0 डॉ.हेमलता श्रीवास्तव
वरिष्ठ समाजशास्त्री

लाइक्स और कमेंट के फेर में लोग तनाव और कुंठा का शिकार हो रहे हैं। अगर कुछ अपलोड करते हैं और उस पर कम लाइक या कमेंट आते हैं, जिसे वह अपने अहम से जोड़ लेते हैं। समझने लगते हैं कि वह अच्छे नहीं है। यह एक तरह से खुद की बनाई अवास्तविक दुनिया में जीने जैसा हैं। इसे मेंटल डिसआर्डर की शुरुआत कहा जा सकता है। इससे बचने के लिए जरूरी है कि लोग इस बात को समझें कि फेसबुक पर अगर लाइक और कमेंट नहीं मिल रहे तो इसका कोई मतलब नहीं है। अपने भीतर यह विश्वास जगाना होगा कि जिंदगी फेसबुक से ही बल्कि वास्तविक रिश्तों से है जो खुशी अपने असली दोस्तों और परिवार के साथ मिलेगी, वह कहीं और नहीं।
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0 प्रो.दीपा पुनेठा
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक
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