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शिक्षक दिवस पर विशेष : विषय की सीमाओं को तोड़ रखी ‘पूरब के ऑक्सफोर्ड’ की नींव, इविवि को शिखर तक पहुंचाया

Thu, 05 Sep 2024 02:55 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

भौतिकी के प्रो. मेघनाद साहा और संस्कृत विभाग के प्रो. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रयासों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातात्विक अध्ययन की शुरुआत हुई। जंतु विज्ञान के प्रो. दक्षिणा रंजन भट्टाचार्य ने संगीत विभाग की नींव रखी। दर्शनशास्त्र विभाग के प्रो. पीआर नायडू ने शिक्षाशास्त्र विभाग की स्थापना की। इतिहास विभाग के प्रो. बेनी प्रसाद ने राजनीति विज्ञान विभाग की स्थापना की।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) को यूं ही ‘पूरब के ऑक्सफोर्ड’ का दर्जा नहीं मिला। इसके पीछे शिक्षा जगत के उन दिग्गजों की कड़ी मेहनत है, जिन्होंने विषय की सीमाओं को तोड़ नए कीर्तिमान गढ़े और दूसरे विषयों में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय को शिखर तक पहुंचाया।

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इन दिनों हर तरफ अंतर्विषयी शिक्षा पर जोर है, जिसकी नींव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डेढ़ सौ साल पहले रख दी गई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले प्रो. मौलवी मोहम्मद जकाउल्ला ने की थी, जो इविवि में सबसे पहले नियुक्त पांच शिक्षकों में से एक थे। उन्हें एक जुलाई 1872 को प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया गया था। प्रो. जकाउल्ला उर्दू, अरबी, फारसी के साथ गणित की कक्षाएं भी लिया करते थे। वह गणित की कक्षाएं उर्दू में लिया करते थे।

भौतिकी के प्रो. मेघनाद साहा और संस्कृत विभाग के प्रो. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रयासों से इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पुरातात्विक अध्ययन की शुरुआत हुई। जंतु विज्ञान के प्रो. दक्षिणा रंजन भट्टाचार्य ने संगीत विभाग की नींव रखी। दर्शनशास्त्र विभाग के प्रो. पीआर नायडू ने शिक्षाशास्त्र विभाग की स्थापना की। इतिहास विभाग के प्रो. बेनी प्रसाद ने राजनीति विज्ञान विभाग की स्थापना की।
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अंग्रेजी विभाग के प्रो. रघुपति सहाय (फिराक गोरखपुरी) ने उर्दू में ‘गुले नगमा’ जैसी कालजयी रचना की तो अंग्रेजी विभाग के डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी में मधुशाला जैसी ‘अद्वितीय’ रचना की। इविवि के पूर्व शिक्षक प्रो. एके श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक ‘इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कीर्तिस्तंभ’ में लिखा है कि ऐसे विद्वानों की वजह से विश्व के अकादमिक जगत ने इविवि को ‘इलाहाबाद स्कूल ऑफ हिस्ट्री’, ‘इलाहाबाद स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स’, ‘इलाहाबाद स्कूल ऑफ फिलाॅसफी’ जैसे सम्मान दिए।

प्रो. धर ने इविवि को दान कर दी थी अपनी संपत्ति

इविवि में प्रो. नील रतन धर जैसे शिक्षक भी रहे, जिन्होंने न सिर्फ दुनिया भर में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय का नाम रोशन किया, बल्कि विश्वविद्यालय और छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी संपत्ति भी दान कर दी। उन्हीं की दान की गई जमीन पर शीलाधर इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई थी। प्रो. धर ने प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से एमएससी की उपाधि प्राप्त की और छात्र जीवन में ही देश के दो महान वैज्ञानिकों प्रो. पीसी रे और प्रो. जेसी बोस के संपर्क में आए। दोनों ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। प्रो. धर के 600 से अधिक शोध पत्र देश-विदेश में प्रकाशित हुए और उनके निर्देशन में 150 छात्रों ने डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की। प्रो. पीसी रे और डॉ. शांति स्वरूप भटनागर जैसे वैज्ञानिकों ने कई बार सार्वजनिक रूप से प्रो. धर को ‘फादर ऑफ इंडियन फिजिकल केमेस्ट्री’ कहकर संबोधित किया।
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नोबल पुरस्कार चयन समिति में शामिल रहे प्रो. बावा करतार सिंह

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भारत के बिरले सिख वैज्ञानिक प्रो. बावा करतार सिंह जैसे शिक्षक भी रहे, जिनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों से प्रभावित होकर नोबल समिति ने उन्हें नोबल पुरस्कार के लिए रसायनविदों को नामित करने का सम्मान दिया। प्रो. बावा ने पहली बार रैकमिक मिक्सचर और रैकमिक कंपाउंड को पहचानने के लिए बायोकेमेकिल तकनीक विकसित की। प्रो. बावा ‘गुरुग्रंथ साहब’ और अन्य सिख धार्मिक ग्रंथों के गहन अध्येता के रूप में विख्यात थे। इसी वजह से उन्हें सिख धर्म की पांच सर्वोच्च पीठों में से एक गुरु गोविंद सिंह जी के जन्म स्थान पटना साहिब के ‘तख्त हरमंदर साहब’ की प्रबंध समिति का अध्यक्ष भी चुना गया था।
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