इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक प्रो. विजय शंकर शुक्ल ने कहा कि 19 वीं, 20 वीं शताब्दी में प्राच्य विद्या के क्षेत्र में योग्यतम शिष्यों को तैयार करने वाले ऐसे महामनीषी के सांस्कृतिक अवदानों को हमेशा याद किया जाता रहेगा।
वेदज्ञ पं. क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय नवीनतम पश्चिमी पांडित्य और गूढ़तम प्राच्य विद्या के अद्भुत समन्वय थे। वेद विद्या के उत्थान के साथ ही इतिहास पर सम्यक दृष्टि के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा। यह बातें बृहस्पतिवार को इलाहाबाद संग्रहालय में उनकी 126वीं जयंती पर आयोजित क्षेत्रेशचंद्र स्मृति व्याख्यानमाला की अध्यक्षता कर रहे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने कही।
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दीप प्रज्जवलन, पुष्पांजलि और सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय के विद्यार्थियों की ओर से मंगलाचरण के साथ व्याख्यानमाला का शुभारंभ हुआ। इस दौरान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और आचार्य क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय भारत विद्यानुशीलन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय प्राच्य विद्या के प्रतीक पुरुष पंडित क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय के व्यक्तित्व-कृतित्व पर विस्तार से चर्चा की गई।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के निदेशक प्रो. विजय शंकर शुक्ल ने कहा कि 19 वीं, 20 वीं शताब्दी में प्राच्य विद्या के क्षेत्र में योग्यतम शिष्यों को तैयार करने वाले ऐसे महामनीषी के सांस्कृतिक अवदानों को हमेशा याद किया जाता रहेगा। इस दौरान क्षेत्रेशचंद्र पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से प्रकाशित पुस्तिका का लोकार्पण भी किया गया। बतौर मुख्य वक्ता बीएचयू के धर्म विज्ञान संकाय के प्रो. हृदय रंजन शर्मा ने कहा कि वेद विश्व के प्राचीनतम प्रमाणिक ग्रंथ हैं। उन्होंने वेदों की महत्ता पर रोशनी डाली।
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इनके बाद प्रो. महेश चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने पिता से जुड़ी स्मृतियों को साझा किया। संग्रहालय की ओर से धन्यवाद ज्ञापन संग्रहपाल डॉ. ओंकार ए वानखेड़े ने और संचालन डॉ. राजेश मिश्र ने किया। इस मौके पर प्रो. मानस मुकुल दास, प्रो. गौरी चट्टोपाध्याय, प्रो. अनामिका राय, प्रो. आरसी त्रिपाठी, प्रो राजेंद्र कुमार, डॉ. रंजन शुक्ल, डॉ. शांति चौधरी, डॉ. मधुरानी शुक्ला, प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, प्रो. मृदुला त्रिपाठी, प्रो. एमएन सिंह समेत तमाम लोग उपस्थित थे।