राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन को सफल बनाने में जिन नायकों को इतिहास कभी नहीं भुला नहीं पाएगा, उनमें एक नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस (स्व.)देवकीनंदन अग्रवाल का भी है।
मंदिर आंदोलन को निर्णायक विजय में बदलने में उनकी भूमिका अहम साबित हुई। यह जस्टिस देवकीनंदन की सूझबूझ का ही नतीजा है कि अदालत में फैसला न सिर्फ मंदिर के पक्ष में आया बल्कि राममंदिर के लिए भूमि अधिग्रहण का रास्ता भी साफ हो सका।
उन दिनों जस्टिस देवकीनंदन के सहयोगी रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण गुप्ता बताते हैं कि, मंदिर को लेकर फैजाबाद के सिविल कोर्ट में चल रहे मुकदमे में सबसे बड़ी अड़चन थी कि मंदिर का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था।
जो पक्षकार मुकदमा लड़ रहे थे, उनका सीधे मंदिर से कोई जुड़ाव नहीं बनता था। ऐसे में जस्टिस देवकीनंदन ने ही सुझाया कि हमें रामलला विराजमान को ही पक्षकार बनाना चाहिए।
जब रामलला खुद पक्षकार बन जाएंगे तो यह अड़चन दूर हो जाएगी। प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति को सिविल कानून में जीवित व्यक्ति के समान दर्जा प्राप्त है। चूंकि रामलला ईश्वर हैं इसलिए उनकी मृत्यु नहीं हो सकती।
इस बारे में अशोक सिंहल से भी वार्ता हुई। उनकी सहमति मिलने के बाद उन्होंने एक जुलाई 1989 को लखनऊ खंडपीठ ने रामलला विराजमान को पक्षकार बनाने के लिए याचिका दाखिल की।
यह याचिका स्वीकार कर ली गई। मगर चूंकि रामलला विराजमान बाल रूप में हैं इसलिए उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए रामसखा की आवश्यकता थी। जस्टिस देवकीनंदन ने स्वयं को रामसखा के रूप में प्रस्तुत करते हुए सिविल सूट नंबर पांच दाखिल किया।