स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांति के स्थलों पर शोध करने वाले आदर्श मालवीय लिखते हैं कि क्रांतिकारियों के बड़े अड्डे के रूप में बेली गांव को ब्रिटिश खुफिया एजेंटों ने चिह्नित कर लिया था। यह संभवत: आजादी का प्रथम उद्घोष था, जब गांव-गांव से युवा भारत माता के जयकारे लगाते हुए घरों से निकलने लगे थे। छह जून को विद्रोह इस कदर फैला कि अंग्रेज जान बचाकर सुरक्षित स्थानों पर जाने की तैयारी करने लगे।
कुछ अंग्रेज अफसरों के साथ ब्रिटिश सेना के जवानों के बेली गांव पहुंचने की जानकारी मिलने के बाद जनता ने विरोध शुरू कर दिया। आदर्श लिखते हैं कि बेली गांव से मेंहदौरी तक कछारी क्षेत्र में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को घेर लिया। अंग्रेज पीछे हटने लगे।
अंग्रेज बेली गांव पार कर रहे थे, तभी गांव के प्रतिष्ठित किसान नादिर के नेतृत्व में वहां के कब्रिस्तान के पास क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया। इस विद्रोह में अंग्रेज सिपाहियों के साथ ही तत्कालीन कलक्टर की पुत्री की भी मौत हो गई। इसकी जानकारी मिलने के बाद लार्ड कैनिन के निर्देश पर अंग्रेजी फौज ने पूरे इलाके को घेर लिया।
कचहरी से लेकर बेली गांव के बीच अंग्रेजी फौज कहर बनकर टूट पड़ी। सरस्वती पत्रिका के संपादक अनुपम परिहार की पुस्तक उत्तर प्रदेश का स्वतंत्रता संग्राम प्रयागराज में भी इस घटना का उल्लेख है। परिहार लिखते हैं कि तब बेली गांव को अंग्रेजों ने श्मशान बना दिया था। बेली गांव के जमींदार मोहसिन अली के घर पर दो बम भी मारे गए थे।
इसमें मोहसिन के मकान समेत आसपास के भवन भी क्षतिग्रस्त हो गए थे। तब अंग्रेजों ने गांव में चुन-चुन कर न सिर्फ क्रांतिकारियों, किसानों और निर्दोष नागरिकों को मारा, बल्कि उनके घरों में लूटपाट भी की थी। घरों में घुसकर कीमती वस्तुओं और आभूषण तक अंग्रेज उठा ले गए। नादिर और मोहसिन अली के साथ ही गांव के अन्य बड़े किसानों की भूमि भी छीन ली गई थी।