भूमा पीठाधीश्वर स्वामी अच्युतानंद सरस्वती की ओर से स्वयं को शारदापीठ का शंकराचार्य घोषित किए जाने को लेकर सनातन धर्मक्षेत्र में मचा भूचाल थमा नहीं है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने इस कार्य को सनातन धर्म के नियम-परंपरा के विरुद्ध बताया है। स्वामी अच्युतानंद सरस्वती और पट्टाभिषेक करने वाले काशीसुमेरू पीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती से पहले ही अखाड़ा परिषद ने नाता तोड़ लिया था, अब उनके अभिनंदन समारोह में शामिल होकर परिषद के फरमान को न मानने पर जूना अखाड़े ने अपने दो श्रीमहंतों अर्जुन पुरी और विनोद गिरि को बहिष्कृत कर दिया है।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक होली से पहले परिषद की हरिद्वार में होने वाली बैठक में इस निर्णय पर अखाड़ों की मुहर लगेगी। इतना ही नहीं प्रयाग अर्द्धकुंभ में चारों पीठों के शंकराचार्यों के अतिरिक्त किसी को भी बतौर शंकराचार्य मेला क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। इस बारे में शासन-प्रशासन से मांग की जाएगी। वहीं अखाड़ा परिषद के आह्वान पर नागा संन्यासी भी फर्जी शंकराचार्यों को बाहर करने के लिए मुहिम छेड़ेंगे।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रतिनिधि शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने स्वामी अच्युतानंद को शंकराचार्य का रूप धरने वाला ‘बहुरूपिया’ कहा है। उन्होंने इसे उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और सियासी षड्यंत्र बताया है। कहा, परंपरा के विरुद्ध पट्टाभिषेक करने पर स्वामी अच्युतानंद पर सोमवार को द्वारका में मुकदमा दायर किया जाएगा। वहीं अखिल भारतीय दंडी संन्यासी प्रबंधन समिति के अध्यक्ष स्वामी विमल देव आश्रम और महामंत्री स्वामी ब्रह्माश्रम ने भी इसे मनमाना रवैया और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
परंपरा के मुताबिक किसी संत का शंकराचार्य पद पर पट्टाभिषेक, चारों मान्य पीठों में से किसी एक पीठ का शंकराचार्य ही कर सकता है। पट्टाभिषेक के बाद सातों संन्यासी अखाड़ों की ओर से मान्यता और सम्मान स्वरूप चादर ओढ़ाई जाती है। जहां तक द्वारका-शारदा पीठ के शंकराचार्य के अभिषेक की बात है तो वह द्वारकाधीश मंदिर के बगल मेें बने चबूतरे पर ही किया जाता है। इसके बाद मंदिर का प्रधान पुजारी उन्हें आदरपूर्वक मंदिर के गर्भगृह में ले जाता है, जहां वह द्वारकाधीश की आरती उतारकर उनका आशीर्वाद लेते हैं।