इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के वीसी ने कहा कि वे इस्तीफा देने को हैं तैयार
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आपसी खींचतान में दाखिले की प्रक्रिया एक बार फिर पिछड़ गई है। विवाद की वजह से पूरी प्रक्रिया नए सिरे से अपनानी पड़ेगी। नई परिस्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने सबसे पहली चुनौती हर पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग निदेशकों की नियुक्ति की है। अफसरों के दावों के अनुसार आगामी सप्ताह में नए निदेशकों की नियुक्ति कर ली गई तब भी इसके बाद आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने में ही कम से डेढ़ से दो महीने लग जाएंगे। ऐसे में सत्र शुरू होने से पहले सभी पाठ्यक्रमों के लिए दाखिले की प्रक्रिया पूरी हो पाएगी, इसे लेकर अफसर भी आश्वस्त नहीं हैं। यानी, इस बार भी अन्य संस्थानों में दाखिला से वंचित रह गए छात्र-छात्रा ही यहां प्रवेश के लिए आएंगे।
लंबी कवायद के बाद विश्वविद्यालय में सत्र 2015-16 में स्नातक, परास्नातक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश प्रक्रिया समय से पूरी हो पाई थी, लेकिन पिछले साल पूरी प्रक्रिया विवादों की भेंट चढ़ गई। विवाद का सिलसिला अभी थमा नहीं है। बीएचयू तथा अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के साथ यहां भी प्रवेश लिए जाएं इस मकसद से काफी तत्परता दिखाई गई। जनवरी के पहले सप्ताह में ही प्रवेश निदेशकों की नियुक्ति कर दी गई, लेकिन विवादित नियुक्ति के विरोध में छात्रों के उग्र आंदोलन के बाद प्रवेश समिति भंग कर दी गई। कॉमन इंट्रेस टेस्ट में शामिल होने के निर्णय पर भी राजस्थान विश्वविद्यालय से सहमति नहीं बन पाई है।
इस पूरी कवायद में प्रवेश प्रक्रिया दो महीने पिछड़ चुकी है। विवादों को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने हर पाठ्यक्रम के लिए अलग-अलग निदेशकों की नियुक्ति का निर्णय लिया है। अफसरों का दावा है कि निदेशकों के नाम भी तय कर लिए गए हैं और एक सप्ताह में इस बाबत आदेश जारी कर दिया जाएगा। हालांकि कोई नया विवाद न हो तब। यदि ऐसा होता है तब भी कार्यक्रम तय होने में ही कम से कम 15 दिन लग जाएंगे। यानी, बहुत जल्द प्रक्रिया शुरू हुई तब भी विश्वविद्यालय अन्य संस्थानों से ढाई से तीन महीने पीछे हो जाएगा।
विश्वविद्यालय में ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा कराने के लिए नए सिरे से समझौता करना होगा। पिछले साल प्रवेश परीक्षाओं में काफी विवाद हुआ था। इसमें प्रवेश परीक्षा कराने वाली एजेंसी की गड़बड़ी भी सामने आई थी। इसकी वजह से विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब उस एजेंसी से परीक्षा न कराने का निर्णय लिया है। ऐसे में नए सत्र के लिए नई एजेंसी ढूंढनी पड़ेगी, लेकिन पूर्व के विवाद को देखते हुए यह काम भी आसान नहीं होगा। इसके अलावा पिछले साल की शर्त लागू हुई तो एजेंसी को ऑनलाइन के साथ ऑफलाइन प्रवेश परीक्षा कराने की भी जिम्मेदारी उठानी होगी। इससे भी समझौता आसान नहीं होगा।