1978 में पहली हत्या करने के बाद अतीक ने जिले की आपराधिक दुनिया में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो उससे पहले किसी को नसीब नहीं हुआ था। जरायम की दुनिया में उस वक्त चांद बाबा छाया हुआ था। अतीक भी कुछ समय चांद बाबा की छत्रछाया में रहा लेकिन धीरे धीरे उसने अपना गैंग खड़ा कर लिया। इसी कारण चांद बाबा अतीक का विरोधी हो गया। शहर की आपराधिक दुनिया दो भागों में बंट गई।
नए लड़के अतीक के साथ हो गए। पुराने चांद बाबा के साथ में थे। बात बढ़ी और अतीक व चांद बाबा एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। जब अतीक ने चांद बाबा को कोतवाली क्षेत्र में मरवाया तो जुर्म की दुनिया में उसका सिक्का चलने लगा। इसके बाद तकरीबन 15 वर्षों तक किसी ने उसे चुनौती नहीं दी। 2005 में जब राजू पाल की हत्या हुई तो अतीक के दुर्दिनों की शुरुआत हो गई।
प्रयागराज जिले की जरायम की दुनिया में अतीक ऐसा नाम था जो वक्त के साथ सफेदपोश हो रहा था। 1989 में विधायक बनने के बाद ही अतीक सूबे के बड़े नेताओं के संपर्क में आ गया था। शहर पश्चिम सीट से उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था। भले ही वह निर्दलीय लड़े, सपा से लड़े या फिर अपना दल से। पार्टियों का सिर्फ नाम होता था। सिक्का चलता था अतीक अहमद का। शहर पश्चिम से वह कई बार विधायक रहा था।