पंकज दुबे ने बताया कि याचियों की उक्त भूमि का अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण अधिनियम-1894 की धारा 17(1)(4) के तहत किया गया था। किसानों ने 11 सितंबर 2008 और 30 सितंबर 2009 की भूमि अधिग्रहण की अधिसूचनाओं को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2010 को किसानों की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर 2008 और 30 सितंबर 2009 की अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया। पंकज दुबे ने बताया कि सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार प्रक्रिया का पालन करते हुए दोबारा भूमि अधिग्रहण करने के लिए स्वतंत्र होगी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद याचियों ने एडीएम से राजस्व रिकॉर्ड से नोएडा का नाम हटाने की अर्जी दी। अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (भूमि अध्याप्ति) ने याचियों का प्रत्यावेदन खारिज कर दिया। जिसके बाद हाईकोर्ट में यह याचिका की गई।
कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर प्रशासन को राजस्व अभिलेखों से नोएडा का नाम हटाने और किसानों की भूमि पर उनका नाम चढ़ाने के लिए चार सप्ताह के अंदर आदेश पर अमल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि नोएडा और जिला प्रशासन भूमि अधिग्रहण करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके लिए उनके पास कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया अपनाने का विकल्प रहेगा।