स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों की मानी जाए तो शहर से लेकर गांव तक संचालित होने वाले नर्सिंगहोमों को मिलाकर कुल 26 पैथालॉजी का ही पंजीयन हुआ है। बाकी सब अवैध हैं। निजी अस्पतालों में भी पैथालॉजी के लिए पैथालाजिस्ट नहीं हैं। दरअसल, अस्पताल संचालकों के नाम पर ही पैथालॉजी का पंजीयन हुआ है। वह न तो अपने सामने जांच करा पाते हैं और न ही रिपोर्टिँग करते हैं। इसके चलते पैथालॉजी पर बैठने वाले कर्मचारी मनमर्जी रिपोर्ट तैयार कर मरीजों को थमा देते हैं। इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग के अफसर चुप्पी साधे हुए हैं। इससे मरीज परेशान हो रहे हैं।
कमीशन के फेर में सरकारी अस्पताल की रिपोर्ट नहीं मानते चिकित्सक
जनपद के सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक खुद के अस्पताल की पैथालॉजी पर भरोसा नहीं करते हैं। कमीशन के चक्कर में मरीजों को परेशान करते हैं। उन्हें प्राइवेट अस्पताल में भेजते हैं।
शासन के आदेश की सीएमओ कर रहे अनदेखी
शासन के आदेश की सीएमओ अनदेखी कर रहे हैं। शासन ने आदेश दिया है कि एमडी पैथॉलाजिस्ट के नाम पर ही पैथालॉजी का लाइसेंस जारी किया जाए। इतना ही नहीं उसे खुद से जांच करना होगा और रिपोर्टिंग कर मरीजों को देना होगा। मगर जनपद में सिर्फ एक पैथालॉजी पर ही एमडी पैथालाजिस्ट है। स्वास्थ्य विभाग के अफसर और कर्मचारी संचालकों से मोटी रकम लेकर बगैर एमडी के ही उनके लाइसेंस का रेन्यूवल कर देते हैं।
अल्ट्रासाउंड करते हैं पैथालॉजिस्ट, खून की जांच करता है अनपढ़
शहर में स्थित कुछ पैथालॉजी केंद्रों पर पैथालाजिस्ट अल्टासाउंड करने में लगे रहते हैं, जबकि खून-पेशाब की जांच के लिए उन्होंने दो कर्मचारियों को रखा है। वह अपने तरीके से जांच कर रिपोर्ट मरीजों को दे देते हैं।
इस मामले में सीएमओ अरविंद श्रीवास्तव का कहना है कि, जिले में अवैध रूप से चलने वाले पैथालॉजी के बारे में जानकारी नहीं है। पंजीकृत पैथालॉजी के बारे में रिकार्ड देखकर ही बताया जा सकता है।