दूसरा, याची का पति सबइंस्पेक्टर है। मासिक कमाई के आधार पर भरण पोषण की राशि बढ़ाई जाए। परिवार न्यायालय ने सात हजार रुपये भरण पोषण की राशि तय की थी। इसके लिए याची रंजीता की ओर से तर्क दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा के मामले में आवेदन की तारीख से भरण पोषण के भुगतान का आदेश दिया है। उसके आदेश का पालन किया जाए। जबकि, प्रतिवादी पति की ओर से तर्क दिया गया कि मामले में उसका काफी व्यय हुआ है। इसके अलावा वह अपनी इकलौती बेटी की देखभाल भी कर रहा है।
कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक मामले में प्रतिवादी यानी पति ही परिस्थितियों का शिकार बना और उसकी पत्नी किसी भी रखरखाव राशि की हकदार नहीं थी। इसके बावजूद परिवार न्यायालय ने गुजारा भत्ता के तहत सात हजार रुपये प्रतिमाह की राशि तय की, जो सही है। निचली अदालत का दृष्टिकोण यथार्थवादी और निर्णय विवेकपूर्ण है। इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।