प्रयागराज हिंदी नाट्य आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। आजादी के पहले ही अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए रामलीला, रासलीला और नाट्य दल, नौटंकी जैसी प्रदर्शनकारी कलाएं हिंदी को जन प्रिय बनाने का माध्यम बन गईं। इसमें प्रयागराज के साहित्यकार माधव शुक्ल, कृष्ण देव उपाध्याय के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। माधव शुक्ल ने 1898 सीय स्वयंबर, 1916 महाभारत पूर्वाध और भामाशाह की राजभक्ति नामक नाटकों की रचना कर हिंदी आंदोलन को गति प्रदान की। लोक नाट्यविद अतुल यदुवंशी बताते हैं कि उस दौर में ये सभी नाटक सफलता के साथ खेले गए थे और तब माधव शुक्ल ने भी उन मंचनों में अभिनय किया था।
खास बात यह रही कि प्रयागराज के अलावा ये नाटक तब कोलकाता में भी हिंदी में ही मंचित किए गए। नाट्य निर्देशक प्रवीण शेखर बताते हैं कि प्रयागराज हिंदी नाटकों का हमेशा से गढ़ रहा है। इस धरती ने एकांकी सम्राट डॉ राम कुमार वर्मा, उपेंद्र नाथ अश्क और धर्मवीर भारती जैसे ऐसे नाटककार पैदा किए, जिनके नाटकों को विश्व पटल पर सराहना मिली। नाट्य निर्देशक रतन थियाम ने अंधायुग को लेकर पूरी दुनिया की नाट्य यात्रा की। इंग्लैंड, अमेरिका, आस्ट्रेलिया के अलावा जापान और कंबोडिया में भी धर्मवीर के अंधायुग का मंचन रतन थियाम ने किया।
इतना ही नहीं इसमें कई विदेशी रंगकर्मियों ने भी अभिनय किया। डॉ राम कुमार वर्मा की पुत्री राजलक्ष्मी वर्मा बताती हैं कि तव वह बहुत छोटी थीं, जब पिता जी के नाटक ध्रुव स्वामिनी को जापान के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था। जापान में ही उनके नाटक औरंगजेब की आखिरी रात का मंचन किया गया था। इसी तरह उपेंद्र नाथ अश्क के नाटक परदा उठाओ परदा गिराओ का भी मंचन इंग्लैंड में किया जा चुका है। इनके अलावा कहानीकार दूधनाथ सिंह के नाटक यमगाथा को भी देश भर में मंचित किया गया ।