इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल धोखाधड़ी या छल जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से कोई दीवानी (सिविल) विवाद आपराधिक मामला नहीं बन जाता। व्यावसायिक समझौतों में भुगतान के विवाद विशुद्ध रूप से सिविल कोर्ट के दायरे में आते हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केवल धोखाधड़ी या छल जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने से कोई दीवानी (सिविल) विवाद आपराधिक मामला नहीं बन जाता। व्यावसायिक समझौतों में भुगतान के विवाद विशुद्ध रूप से सिविल कोर्ट के दायरे में आते हैं। इनके लिए पुलिस या आपराधिक अदालतों का शॉर्टकट रास्ता अपनाना कानून का दुरुपयोग है।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने चीन की कंपनी के मालिक हे हाओमिन के खिलाफ गौतमबुद्ध नगर में चल रही आपराधिक कार्यवाही और चार्जशीट रद्द कर दी। मामला गौतमबुद्ध नगर के दादरी थाना क्षेत्र का है। विवाद दो कंपनियों के बीच प्लांट स्थापना के अनुबंध से जुड़ा है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 1.40 करोड़ रुपये के काम में से केवल 42 लाख रुपये का आंशिक भुगतान किया गया और शेष 98 लाख रुपये नहीं दिए गए।
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को भी दी नसीहत
हाईकोर्ट ने पाया कि आंशिक भुगतान किया गया था। इसलिए शुरुआत से ही धोखा देने की मंशा साबित नहीं होती। महज बाद में भुगतान न करना अनुबंध का उल्लंघन है, धोखाधड़ी नहीं। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को भी नसीहत दी कि मजिस्ट्रेट को मूकदर्शक बनकर समन जारी नहीं करना चाहिए, बल्कि विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। शिकायतकर्ता बकाया धन की वसूली के लिए दीवानी अदालत या मध्यस्थता का सहारा ले सकता है।