इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 52 साल पहले मिलावटी दूध बेचने के आरोप में दर्ज मुकदमे से बरी हुए दूध विक्रेता की बेगुनाही पर अपनी मुहर लगा दी। यह आदेश न्यायमूर्ति राजबीर सिंह की एकल पीठ ने आगरा नगर महापालिका ( अब नगर निगम) के स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 52 साल पहले मिलावटी दूध बेचने के आरोप में दर्ज मुकदमे से बरी हुए दूध विक्रेता की बेगुनाही पर अपनी मुहर लगा दी। यह आदेश न्यायमूर्ति राजबीर सिंह की एकल पीठ ने आगरा नगर महापालिका ( अब नगर निगम) के स्वास्थ्य अधिकारी की ओर से ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए दिया है।
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कोर्ट ने कहा कि यदि ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित और उचित दृष्टिकोण है, तो अपीलीय अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं करेगी। मामला वर्ष 1974 का है। आरोप था कि गौरी शंकर साइकिल से बिक्री के लिए गाय का दूध ले जा रहे थे। खाद्य निरीक्षक ने 666 मिलीलीटर दूध का नमूना लेकर जांच कराई, जिसमें दूध मानक के अनुरूप नहीं पाया गया। इसके बाद उनके खिलाफ खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। हालांकि 24 जुलाई 1978 को आगरा की ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों में खामियां पाते हुए आरोपी को बरी कर दिया था।
इस फैसले के खिलाफ वर्ष 1985 में दायर अपील पर सुनवाई के दौरान किसी भी पक्ष की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर मामले का निस्तारण करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन किया था। घटना का कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। अभियोजन के दोनों गवाह सरकारी कर्मचारी थे। ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन की कहानी में महत्वपूर्ण विरोधाभास और कमियां दर्ज की थीं। कोर्ट ने कहा कि बरी किए गए आरोपी के पक्ष में बेगुनाही की दोहरी धारणा होती है। यदि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दो संभावित निष्कर्ष निकल सकते हों, तो अपीलीय अदालत केवल अलग दृष्टिकोण संभव होने के आधार पर दोषमुक्त करने के आदेश में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।