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High Court : दुष्कर्म मामले के चार आरोपियों को बरी करने का फैसला हाईकोर्ट ने रखा बरकरार

Wed, 23 Oct 2024 07:01 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

मेडिकल जांच में भी यौन उत्पीड़न के आरोप साबित नहीं हो रहे हैं। बिना उचित कारण दिए एफआईआर 15 दिन की देरी से दर्ज कराई गई। पीड़िता 25-26 दिन आरोपी के साथ रही। लेकिन, उसने अपने बचाव के लिए किसी से मदद नहीं मांगी।
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अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने 2009 के एक कथित बलात्कार मामले में चार लोगों को बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता सहमति देने वाली पार्टी की प्रतीत होती है। मेडिकल जांच में भी यौन उत्पीड़न के आरोप साबित नहीं हो रहे हैं। बिना उचित कारण दिए एफआईआर 15 दिन की देरी से दर्ज कराई गई। पीड़िता 25-26 दिन आरोपी के साथ रही। लेकिन, उसने अपने बचाव के लिए किसी से मदद नहीं मांगी। इन तथ्यों के आधार पर न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने सरकारी अपील को स्वीकारोक्ति के चरण में ही खारिज कर दी।

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कानपुर देहात के रूरा थाने में 22 अप्रैल 2009 को शिकायतकर्ता ने नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म व अपहरण का मुकदमा दर्ज कराया था। उसने आरोप लगाया कि सात अप्रैल 2009 को आरोपी बलवान सिंह, अखिलेश, सिया राम और विमल चंद्र तिवारी ने उसकी बेटी का अपहरण किया। पुलिस ने पीड़िता को तीन मई 2009 को आरोपी बलवान सिंह के साथ बरामद कर लिया। ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर पाया कि पीड़िता बालिग है। उसने आरोपी के साथ अपनी मर्जी से अपना घर छोड़ दिया था।

अवसर मिलने के बावजूद उसने किसी से मदद नहीं मांगी। ऐसे में अपहरण की बात उचित नहीं लगती। इससे साबित हुआ कि वह स्वेच्छा से आरोपी के साथ गई थी। आरोपियों को आरोपों से बरी कर दिया गया। राज्य ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। खंडपीठ ने मामले के तथ्यों की जांच की तो पाया कि घटना के 15 दिन बाद एफआईआर दर्ज की गई थी और अभियोजन पक्ष ने इस देरी का उचित कारण नहीं बताया।
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अदालत ने आगे कहा कि पीड़िता अपनी गवाही के अनुसार 25-26 दिनों तक आरोपी बलवान के साथ रही। फिर भी, उसने यात्रा के दौरान राहगीरों से सहायता मांगने के लिए कभी भी कोशिश नहीं की। मेडिकोलीगल जांच रिपोर्ट यौन उत्पीड़न के आरोपों की पुष्टि नहीं करते। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर संदेह करने का कोई कारण नहीं पाते हुए राज्य की अपील को खारिज कर दिया।

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