इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 37 साल पहले जानलेवा हमले में गैरकानूनी जमावड़े के लिए छह माह की सजा पाए दोषी को बरी कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि सामान्य उद्देश्य के तहत विधि विरुद्ध जमावड़े का अपराध तभी गठित होता है, जब घटना में कम से कम पांच व्यक्ति शामिल हों।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 37 साल पहले जानलेवा हमले में गैरकानूनी जमावड़े के लिए छह माह की सजा पाए दोषी को बरी कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि सामान्य उद्देश्य के तहत विधि विरुद्ध जमावड़े का अपराध तभी गठित होता है, जब घटना में कम से कम पांच व्यक्ति शामिल हों।
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यह आदेश न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने बस्ती के बिगरंछू की अपील पर दिया है। मामला मार्च 1986 का है। कोतवाली थाना क्षेत्र में जमीन विवाद को लेकर रघुवंश उपाध्याय और उनके पिता पर लाठी-डंडों से हमला किया गया था। पुलिस ने राम पालट, बिगरंछू समेत सात के खिलाफ हत्या के प्रयास और लूट की धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया था।
ट्रायल कोर्ट ने 1989 में चार आरोपियों को बरी कर दिया था पर राम पालट और बिगरंछू को गैर कानूनी जमावड़े का सदस्य मानते हुए छह माह की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई थी। चार को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया था। गैरकानूनी जमावड़े के गठन के लिए कम से कम पांच व्यक्तियों का होना अनिवार्य है।
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मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष ने केस की शुरुआत में केवल नामजद आरोपियों का जिक्र किया था। किसी भी अज्ञात व्यक्ति की संलिप्तता की बात नहीं कही गई थी। क्योंकि, सात में से चार आरोपी बरी हो चुके थे। इसलिए अब केवल दो आरोपी बचे थे। दो व्यक्तियों से विधि विरुद्ध जमावड़े का अपराध गठित नहीं होता।