इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी व निगम के क्रय केंद्रों पर तैनात कर्मचारी व्यापारी की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए उन पर व्यापारियों के लिए लागू होने वाले लाइसेंसिंग नियम नहीं थोपे जा सकते। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने बदायूं के पीतांबर दास की आपराधिक अपील को स्वीकार कर ट्रायल कोर्ट से मिली सजा रद्द दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत किसी कर्मचारी को तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक अभियोजन यह साबित न कर दें कि उसने किसी विशेष नियंत्रण आदेश का उल्लंघन हुआ है।
मामला 30 मई 1984 का है, जब बिसाउली (बदायूं) के तत्कालीन एसडीएम ने गेहूं खरीद केंद्र का निरीक्षण किया था। वहां रिकॉर्ड के अनुसार 1251 क्विंटल गेहूं होना चाहिए था पर भौतिक सत्यापन में 1263 क्विंटल मिला। 12 क्विंटल गेहूं अधिक पाए जाने पर केंद्र प्रभारी पीतांबर दास के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया गया। निचली अदालत ने 1988 में उन्हें दो साल की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
अपीलार्थी के वकील ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष यह बताने में विफल रहा कि आरोपी ने किस विशिष्ट नियम या आदेश का उल्लंघन किया है। कोर्ट ने पाया कि निरीक्षण करने वाले अधिकारियों ने न तो गेहूं की ग्रेडिंग (श्रेणी) की जांच की और न ही जिरह के दौरान स्टॉक रजिस्टर की प्रविष्टियों के बारे में ठोस जानकारी दे पाए।
कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा तीन केवल सरकार को नियम बनाने की शक्ति देती है। जब तक कोई कंट्रोल ऑर्डर लागू न हो और उसके उल्लंघन का विवरण न दिया जाए, तब तक धारा सात के तहत दंड नहीं दिया जा सकता। अपीलार्थी केवल क्रय केंद्र का प्रभारी था। वह कोई निजी लाइसेंस धारक या व्यापारी नहीं था। ऐसे में उस पर नियंत्रण आदेश के उल्लंघन का प्रश्न ही नहीं उठता। धारा 3/7 व्यापारियों पर लागू होती है, कर्मचारी पर नहीं।