इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मकान मालिक को तय करना है कि वह अपनी जमीन पर कैसे और किस तरह से जीवन जीना चाहता है। किरायेदार या कोई अन्य मकान मालिक को निर्देशित, नियंत्रित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। गौरीशंकर प्रजापति, शारदा और श्याम सिंह ने याचिका दायर की थी।
मामले में याची बांदा जिले में 500 रुपये मासिक किराये की दुकान में कारोबार करते हैं। इस दौरान मकान मालिका ने अपने बेटे को प्रिंटिंग प्रेस का व्यवसाय कराने के लिए किरायेदारों से दुकान खाली कराने के लिए आवेदन उत्तर प्रदेश अधिनियम 1972 की धारा 21 (1) (ए) के तहत दायर किया। इसके विरोध में किरायेदार ने लिखित बयान दर्ज कराते हुए कहा कि मकान मालिक एक साधन संपन्न व्यक्ति है। जरूरत को पूरा करने के लिए उनके पास वैकल्पिक आवास है। उन्होंने खाली दुकानों की फोटो भी दाखिल की। ट्रायल कोर्ट का फैसला किरायेदारों के पक्ष में नहीं गया। इस पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।