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हाईकोर्ट ने कहा : किरायेदार नहीं, मकान मालिक तय करेगा कि वह अपनी जमीन में कैसे रहेगा

Fri, 22 Mar 2024 05:35 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

यमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। गौरीशंकर प्रजापति, शारदा और श्याम सिंह ने याचिका दायर की थी। मामले में याची बांदा जिले में 500 रुपये मासिक किराये की दुकान में कारोबार करते हैं। इस दौरान मकान मालिका ने अपने बेटे को प्रिंटिंग प्रेस का व्यवसाय कराने के लिए किरायेदारों से दुकान खाली कराने के लिए आवेदन उत्तर प्रदेश अधिनियम 1972 की धारा 21 (1) (ए) के तहत दायर किया।
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अदालत। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मकान मालिक को तय करना है कि वह अपनी जमीन पर कैसे और किस तरह से जीवन जीना चाहता है। किरायेदार या कोई अन्य मकान मालिक को निर्देशित, नियंत्रित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। गौरीशंकर प्रजापति, शारदा और श्याम सिंह ने याचिका दायर की थी।

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मामले में याची बांदा जिले में 500 रुपये मासिक किराये की दुकान में कारोबार करते हैं। इस दौरान मकान मालिका ने अपने बेटे को प्रिंटिंग प्रेस का व्यवसाय कराने के लिए किरायेदारों से दुकान खाली कराने के लिए आवेदन उत्तर प्रदेश अधिनियम 1972 की धारा 21 (1) (ए) के तहत दायर किया। इसके विरोध में किरायेदार ने लिखित बयान दर्ज कराते हुए कहा कि मकान मालिक एक साधन संपन्न व्यक्ति है। जरूरत को पूरा करने के लिए उनके पास वैकल्पिक आवास है। उन्होंने खाली दुकानों की फोटो भी दाखिल की। ट्रायल कोर्ट का फैसला किरायेदारों के पक्ष में नहीं गया। इस पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।

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याची के अधिवक्ता ने कहा कि मकान मालिक के पास पर्याप्त वैकल्पिक खाली आवास है। अन्य तथ्यों का जिक्र करते हुए कहा कि याचिका स्वीकार करने योग्य है। वहीं मकान मालिक के अधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने कहा कि मकान मालिक का विशेषाधिकार है कि वह अपने परिसर का आवश्यकता अनुसार उपयोग करे। मकान मालिक अपनी आवश्यकताओं का सबसे अच्छा न्यायाधीश है।

कोर्ट ने तथ्यों को देखने के बाद कहा कि इस मामले में संविधान द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करके हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। कानून की स्थापित नियम हैं कि मकान मालिक को तय करना है कि वह कैसे और किस प्रकार से अपना जीवन जिए। इसमें न्यायालय सहित कोई भी व्यक्ति निर्देशित, नियंत्रित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता है। कोर्ट ने किरायेदार की ओर से दायर की गई याचिका खारिज कर दी।
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