जमानत रद्द करने के मामले में अदालत को पहले दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त करना होगा और इसलिए, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की गहराई से जांच किए बिना अदालत आकस्मिक तरीके से जमानत रद्द करने के लिए ऐसे आवेदन की अनुमति नहीं दे सकता है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता संविधान के तहत प्रदान किया गया मौलिक अधिकार है। इसे आसानी से कम नहीं किया जा सकता है। जब तक कि इसके लिए ठोस और भारी परिस्थितियां न हों। कोर्ट ने कहा कि जमानत रद्द करने के संबंध में कानून में यह भी तय है कि जमानत अर्जी खारिज करना आसान है, लेकिन पहले से दी गई जमानत रद्द करना बहुत मुश्किल है और जमानत रद्द करने के लिए बहुत कठिन और ठोस परिस्थितियों का होना जरूरी है।
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जमानत रद्द करने के मामले में अदालत को पहले दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त करना होगा और इसलिए, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की गहराई से जांच किए बिना अदालत आकस्मिक तरीके से जमानत रद्द करने के लिए ऐसे आवेदन की अनुमति नहीं दे सकता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति समीर जैन ने संतोष सिंह की दाखिल जमानत निरस्त कराने की मांग वाली अर्जी को खारिज करते हुए दिया है।
मामले में जमानत पाने वाले के खिलाफ फतेहपुर के थाना खागा में नाबालिग के साथ रेप का आरोप है। पीड़िता के तरफ से याची ने पॉक्सो एक्ट और आईपीसी की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। पुलिस ने जांच के दौरान आरोपी को जेल भेज दिया था। उसने अर्जी दाखिल कर जमानत की मांंग की। कोर्ट ने उसकी जमानत मंजूर कर ली थी। इसी को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।