कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी के एक साल के भीतर तलाक की याचिका की अनुमति नहीं है। क्योंकि, हिंदू विवाह को भंग करने की कार्रवाई का कारण विवाह के पहले वर्ष के भीतर तलाक की नौबत तब तक नहीं आ सकती, जब तक किसी भी पक्ष की ओर से क्रूरता की पराकाष्ठा पार न हो जाए।
ऐसा होता है तो उस मामले में भी विशेष परिस्थितियों का जिक्र करते हुए विशिष्ट अर्जी दाखिल की जानी होगी। जबकि मौजूदा मामले में ऐसी कोई बात उजागर नहीं होती। कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के अभिलेखों के अवलोकन में पाया कि पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी की आपत्तियों को नजरंदाज करते हुए पत्नी के आचरण पर पति की ओर से लगाए गए आक्षेपों पर ही विचार किया था।
कोर्ट ने पत्नी की अपील स्वीकार कर ली। पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही पति की ओर से भरण पोषण की मद से पत्नी को अदा की गई ढाई लाख रुपये की धनराशि को ब्याज समेत लोग लौटने का भी आदेश दिया। वहीं, पत्नी को बेवजह मुकदमेबाजी में घसीटने के लिए पति पर पचास हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।