कोर्ट ने पाया कि एफआईआर दर्ज कराने में दो महीने से अधिक की देरी हुई। इस दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि एफआईआर से पहले ई-मेल के जरिये दोनों के बीच बातचीत हुई थी। पति की ओर से तलाक की कार्रवाई भी शुरू की गई थी। शुरुआती बातचीत में बच्ची के दुष्कर्म का कोई जिक्र नहीं आया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि मेडिकल रिपोर्ट आरोपों का समर्थन नहीं करती। मेडिकल रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर ऐसी चोट, ट्रॉमा या रक्तस्राव नहीं मिला, जिससे लगाए गए गंभीर यौन हमले के आरोपों की पुष्टि हो सके। कोर्ट ने बच्ची की गवाही पर सवाल उठाए। कहा कि उसकी गवाही महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन बाल मन अत्यंत संवेदनशील होता है। जिस अभिभावक के साथ वह लगातार रहता है उसके विचार, शिकायतें और दूसरे अभिभावक के खिलाफ चल रहा विवाद उसके मन पर प्रभाव डाल सकता है।
ऐसे माहौल में बच्चा ऐसी बातों को भी सच मानकर दोहरा सकता है जो वास्तव में उसके स्वयं के अनुभव का हिस्सा नहीं हों। कोर्ट को ताऊ के खिलाफ भी भरोसेमंद साक्ष्य नहीं मिला। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि उन्हें पारिवारिक विवाद के कारण मामले में घसीटा गया।