मेडिकल परीक्षण में भी दुष्कर्म की नहीं हुई पुष्टि
एफआईआर देरी से दर्ज कराई गई जिसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया गया। पीड़िता के कथनों में परस्पर विरोधाभास है। विचारण के दौरान एफआईआर दर्ज कराने वाले और पीड़िता ने यह स्वयं स्वीकार किया कि याची एवं अन्य सह-अभियुक्तों ने उसके साथ दुष्कर्म नहीं किया। न ही वे सब पीड़िता को बुलाकर खेत पर ले गए थे। इस आधार पर उन्हें पक्षद्रोही घोषित किया गया है। चिकित्सीय परीक्षण में भी पीड़िता के साथ रेप की पुष्टि नहीं होती है।
कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपी की सशर्त जमानत मंजूर कर ली। कोर्ट ने अधीनस्थ न्यायालय को निर्देशित किया है कि यदि यह मामला झूठा पाया जाए तो झूठी एफआईआर दर्ज करवाने और विचारण के दौरान अपने की बयान से मुकरने वालों के खिलाफ कड़ी कार्ववाई करें। ऐसे लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाने के साथ ही सरकार की ओर से मिली आर्थिक सहायता की ब्याज समेत वसूली भी की जाए। कोर्ट अनुपालन के लिए आदेश की प्रति संबंधित अधीनस्थ अदालत एवं डीएम को भेजने का निर्देश भी दिया है।
झूठे मुकदमों से रुपये और समय की बर्बादी
कोर्ट ने झूठे मुकदमे दर्ज करवाने और उसके बाद अपने ही बयानों से मुकरने के चलन पर नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने कहा कि आए दिन न्यायालय के समक्ष इस प्रकार के मुकदमे आते हैं। जिसमे पहले रेप, पॉक्सो एक्ट और एससी-एसटी एक्ट में प्राथमिकी दर्ज कराई जाती है, जिसके आधार पर विवेचना चलती है। पीड़ित सरकारी मुआवजा हासिल करते हैं और काफी समय बीतने के बाद विचारण के दौरान अपने बयान से मुकर जाते हैं। फर्जी मुकदमों का परिणाम यह होता है कि अभियोजन की कार्यवाही में लगने वाले समय में निर्दोष आरोपी के जीवन का लंबा समय तो बर्बाद होता ही है, साथ में उन्हें आर्थिक और मानसिक वेदना भी सहन करनी पड़ती है। यह चलन चिंताजनक हैं, रुकना चाहिए।