हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि आरोपी पर रेप की पुष्टि नहीं हो रही है। कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सुबूतों को खारिज करते हुए कहा कि डॉक्टर के साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट में किसी भी शुक्राणु की उपस्थिति नहीं दिखाई देती है। जबकि, प्राथमिकी दर्ज करने के बाद पीड़ित को थाने से सीधे चिकित्सा परीक्षण के लिए ले जाया गया था। अदालत ने यह भी कहा कि पीड़ित के शरीर पर कोई चोट नहीं पाई गई। आरोपी पर एससी/एसटी अधिनियम के तहत भी आरोप सिद्ध नहीं होता है। लिहाजा, सत्र न्यायालय का फैसला एकतरफा और सही नहीं है।
कोर्ट ने मामले में हाईकोर्ट के रजिस्ट्री विभाग की ओर से वर्ष 2008 से 2022 तक सूचीबद्ध नहीं किए जाने पर अफसोस जताया। कोर्ट ने रजिस्ट्री विभाग को विष्णु बनाम यूपी राज्य के मामले में दिए गए फैसले के अनुपालन का आदेश दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के सौदान सिंह के मामले का हवाला देते हुए यूपी सरकार की ओर से मामले में विचार न करने पर नाराजगी जताई। कहा, इससे जेल अधिकारियों का उदासीन रवैये भी पता चलता है।