दावा...मस्जिद का स्वरूप वही जो 1947 में था
याची की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता एसएफए नकवी और पुनीत गुप्ता द्वारा जिला अदालत में लंबित 1991 के सिविल वाद की पोषणीयता पर सवाल खड़े किए। कहा कि याची पक्ष/मस्जिद पक्ष की ओर से इसके लिए दो मजबूत तर्क दिए गए हैं। पूजा स्थल अधिनियम-1991 के तहत किसी भी धार्मिक स्थल का स्वरूप बदला नहीं जा सकता है। प्रावधान के मुताबिक मस्जिद का जो स्वरूप 1947 में था, वह आज भी वैसा ही है। पूजा स्थल अधिनियम किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप में बदलाव को प्रतिबंधित करता है।
-सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश सात और नियम 11 भी इस पर लागू होता है, जिसके तहत जिला अदालत में दाखिल घोषणात्मक सिविल वाद पोषणीय नहीं है।
दलील...यह न 1991 के अधिनियम के दायरे में, न वक्फ के
वहीं, हिंदू पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन, अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी और अजय कुमार सिंह ने पक्ष रखा। दलील दी कि पूजा स्थल अधिनियम इस मामले में लागू नहीं होता है। क्योंकि, यह विवादित स्थल है। पूजा स्थल अधिनियम उन धार्मिक स्थलों पर लागू होता है, जहां विवाद नहीं है।
अधिवक्ता अजय कुमार सिंह ने इसका उदाहरण भी दिया। कहा कि जैसे जामा मस्जिद कोई विवादित स्थल नहीं है। वहां किसी भी तरह का दावा नहीं है। वहां पूजा स्थल अधिनियम पूरी तरह से लागू है, लेकिन ज्ञानवापी विवाद में यह अधिनियम लागू नहीं होता है।
-यह किसी वक्फ अधिनियम के दायरे में भी नहीं आता है। क्योंकि, दावे में परिसर में किसी तरह की तोड़फोड़ या अन्य कार्रवाई की बात नहीं की गई है।