‘रास्तों कहां गए वो लोग, जो मेरे आदाब पे कहते थे कि जीते रहिये’, प्रख्यात कथाकार मार्कण्डेय के बारे में यही सच है। वह दैहिक रुप से भले ही दूर हो गए हों, शाब्दिक उपस्थिति कहती है, मार्कण्डेय मौन नहीं हुए हैं। कवि, कथाकार हों या फिर राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, रंगकर्मी से लेकर एकांकीकुंज के करीब के रिक्शे वाले, खोमचे वाले, पानवाले, ड्राइवर, सब्जीवाले, दादा सभी के दुलारे थे। अपने रचना संसार की तरह ही सिर्फ नामवर ही नहीं आम आदमी से भी उनका आत्मीय रिश्ता था। आम जन मानस से लेकर ग्रामीण जीवन और सामाजिक मुद्दों पर अपने धारदार लेखन से उन्होंने पाठकों के बीच अमिट छाप छोड़ते हुए गहरी पैठ बनाई थी।
वरिष्ठ कथाकार नीलकांत कहते हैं, मार्कण्डेय भले ही बहुत जल्दी गांव छोड़कर शहर आ गए थे, लेकिन गांव की याद उनकी रचनाओं में हमेशा जीवित रही। गांव का परिवेश किसानों, मजदूरों की तकलीफ और जमींदारों की तानाशाही, उन्होंने सभी कुछ को करीब से देखा, समझा था। यही विषय उनकी रचनाओं में अर्थ और आकार लेते रहे।
वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह के मुताबिक मार्कण्डेय भारतीय ग्रामीण यथार्थ के कहानीकार थे, लेकिन यथार्थ को देखने की वर्ग दृष्टि के कारण उन्होंने गांव केसामंतों, बड़े जमींदारों और उनके बरक्स छोटे किसानों और मजदूरों की बात कहानियों में उतारी।
वह गांवों की सहजता और मनुष्य स्वभाव को बारीकी में परखने वाले कथाकार थे।
वरिष्ठ आलोचक राजेंद्र कुमार कहते हैं, मार्कण्डेय जी ने हमेशा नए लेखकों को खूब प्रोत्साहित किया। वह नए रचनाकारों के बहाने स्वयं को सक्रिय मानते थे। नई कहानी के दौरान उनके साथ इलाहाबाद में भी त्रयी बनी थी, जो टूट गई। उन्होंने गांव के अनुभवों को अपनी रचनाओं में सक्रियता से उतारा। वह अच्छे कथाकार, अच्छे संपादक ही नहीं, अच्छे व्यक्ति भी थे।
वरिष्ठ कवि यश मालवीय कहते हैं, प्रेमचंद और अमरकांत की परंपरा पर ही आगे चले मार्कण्डेय ने किसानों के दर्द को जिस तरह से अपनी रचनाओं में दिखाया है, वह आज भी प्रासंगिक है। वह आम लोगों और सांप्रदायिकता के योद्धा लेखक थे। मार्कण्डेय, कमलेश्वर ओर दुष्यंत कुमार की दोस्ती साहित्य जगत में बहुत प्रसिद्ध थी। इलाहाबाद के प्रति उनका लगाव उनकी हर रचना में साफ झलकता है।
कथाकार मार्कण्डेय की पुण्यतिथि पर शुक्रवार को इलाहाबाद संग्रहालय के बृजमोहन व्यास सभागार में दोपहर 2.30 बजे मार्कण्डेय स्मृति संवाद का आयोजन किया जाएगा। दुर्गा सिंह के मुताबिक कथा प्रकाशन की ओर से ‘आधुनिकता, लोकतंत्र और राष्ट्रनिर्माण का सवाल’ पर संवाद, परिचर्चा के साथ मार्कण्डेय की कहानियों का संकलन ‘गुलरा के बाबा’ का विमोचन होगा। अरुण माहेश्वरी मुख्य वक्ता होंगे जबकि राज्यसभा की पूर्व सदस्य सरला माहेश्वरी विशिष्ट अतिथि होेंगी। अध्यक्षता कथाकार नीलकांत करेंगे।