याची के कृत्य को कोर्ट ने निंदनीय और अक्षम्य पाप करार दिया
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचियों की ओर से सीआरपीसी की धारा 482 के तहत पहले चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करते हुए याचियों को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था। याचियों ने कोर्ट का आदेश मानने की बजाय फिर से पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दी।
कोर्ट ने इसे निदंनीय और अक्षम्य पाप करार दिया। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की प्रथा आजकल न्यायालय में प्रचलित हो गई है। बेईमान वादी किसी भी हद तक जाकर अपने पक्ष में आदेश पाने की कोशिश में लगे रहते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार का कदाचार न्यायालय की कार्यवाही में पीठ की छुरा घोंपना कहा जा सकता है। कोर्ट ने अदालताें को सावधान रहने की सलाह दी और याचिका को खारिज कर दिया।