कल तक कल्पवासियों, स्नानार्थियों, श्रद्धालुओं से सजी संगम की रेती बृहस्पतिवार से वीरान होने लगी। कल्पवासियों के जाने से शिविर खाली होने और उजड़ने लगे। माघी पूर्णिमा को तकरीबन माह भर का कल्पवास पूरा हुआ लेकिन कल्पवासियों ने पहले बुधवार को चंद्रग्रहण खत्म होने पर और फिर बृहस्पतिवार को उदयातिथि में संगम सहित गंगा-संगम में डुबकी लगाई। गंगा र्माई का आशीर्वाद लिया। यथाशक्ति दान-दक्षिणा देने के बाद संगम की रेती को विदा कह दिया।
विदाई से पहले कल्पवासियों ने शिविर में तीर्थपुरोहित के ठाकुरजी और तट किनारे गंगा पूजन किया। वापसी में घर से लाया गया तुलसी का बिरवा और हरी-हरी जौ की पौध भी ले जाना नहीं भूले जिसे कल्पवास की शुरु आत के साथ शिविर के सामने बोया गया था। विदाई के समय लोग भावुक हुए। लोगों ने शिविर में संग रह रहे कल्वासियों के फोन-मोबाइल नंबर लिए और फिर अगले बरस आने की कामना और प्रार्थना के साथ उन्हें प्रणाम कहकर विदाई ले ली।
तैयारियां एक दिन पहले से ही हो रही थीं। जरूरी सामान समेट लिया गया था, बस तिथि और मुहूर्त की प्रतीक्षा थी। चंद्रग्रहण पूरा होने के बाद की डुबकी लगाने के साथ ही घर जाने की बेताबी बढ़ी और कल्पवासियों ने सामान समेटकर घर का रुख किया। उनके घर वापसी का सिलसिला सुबह से ही शुरू हुआ जो देर रात तक जारी रहा। इलाहाबाद और ग्रामीण अंचल से बड़ी संख्या में आए कल्पवासियों ने अपना ज्यादातर सामान पहले ही परिजनों के माध्यम से घर भिजवा दिया था।
दरअसल माघी पूर्णिमा से एक दिन पहले ही घर वापसी की तैयारियां पूरी कर ली जाती थीं और पूर्णिमा पर सुबह डुबकी लगाने के बाद कल्पवासी मेला क्षेत्र छोड़ देने लगते थे लेकिन अबकी माघी पूर्णिमा और चंद्रग्रहण के दुर्लभ संयोग के कारण कल्पवासियों ने माघी पूर्णिमा को घर वापसी नहीं की। उन्होंने चंद्रग्रहण के बाद उदयातिथि में डुबकी लगाई, तब घर की ओर रवाना हुए। वापसी में सभी गंगा जल के अतिरिक्त लाई, इलाइचीदाना, कलाईनारा, चूड़ी, बिंदी, सिंदूर सहित रेती का प्रसाद भी संग ले गए।