गंगा प्रदूषण मामले की याचिका स्वामी हरि चैतन्य ब्रह्मचारी ने दाखिल की थी। किंतु बाद में कोर्ट ने इसे गंगा प्रदूषण मामले के रूप में तब्दील कर सुनवाई जारी रखी। याचिका की सुनवाई के दौरान गंगा कछार में लगातार बढ़ रहे अतिक्रमण को रोकने के लिए हाईकोर्ट ने 1973की अधिकतम बाढ़ विंदु को आधार मानकर कर उससे 500मीटर तक निर्माण पर रोक लगा दी।केवल गंगा में प्रदूषण न करने वाले मठ मंदिरों के निर्माण व पुराने भवन के पुनर्निर्माण की अनुमति दी गई।
साथ ही मांग मेले के दौरान पालीथिन की खरीद फरोख्त पर रोक लगा दी। कोर्ट की सख्ती के कारण सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बने और गंगा में सीधे गिरने वाले नालों को बायोरेमेडियल सिस्टम से शोधन की व्यवस्था अपनाई गई। हालांकि कि सरकारी मशीनरी की उदासीनता व ब्लेम गेम के कारण कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह से पालन नहीं किया जा सका।
कोर्ट की 500मीटर में निर्माण पर रोक के कारण संगम किनारे ओमेक्स सिटी योजना का कुछ हिस्सा खटाई में पड़ गया। हालांकि निर्माण पर रोक के आदेश को शासनादेश के तहत दो सौ मीटर तक समेटने की ओमेक्स सिटी के वरिष्ठ अधिवक्ता विजय बहादुर सिंह ने कोशिश की और कहा कि याचिका स्थानांतरित करते समय पुराने सभी आदेश खत्म कर दिए जाए। याचिका पर भारत सरकार के अधिवक्ता राजेश त्रिपाठी, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिवक्ता बाल मुकुंद सिंह, न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुमार गुप्ता, शैलेश सिंह,वीसी श्रीवास्तव ने पक्ष रखा था।