माघी पूर्णिमा स्नानपर्व पर शुक्रवार को पांचवीं डुबकी के साथ रेती पर माह भर के कल्पवास का संकल्प पूरा हुआ। कल्पवासियों सहित लाखों श्रद्धालुओं ने संगम और गंगा-यमुना के विभिन्न घाटों पर पुण्य की डुबकी लगाई। संगम की रेती पर माह भर से जारी जप, तप, दान, अनुष्ठान को पूर्णता मिली। गंगा माई का आशीर्वाद और रेती का पुण्य-प्रसाद लेकर कल्पवासी घरों को लौट गए।
माघी पूर्णिमा का पुण्यकाल पूरे दिन होने से सुबह घाटों पर भले ही थोड़ा कम दबाव रहा लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, घाटों पर स्नानार्थियों के पहुंचने का सिलसिला बढ़ता ही गया। देर शाम तक स्नानार्थियों का रेती पर आने और डुबकी लगाने का क्रम जारी रहा। ‘हर-हर गंगे, माधव सकल काम साधो’ के जयकारों के साथ श्रद्धालु त्रिवेणी तट पहुंचते रहे। हालांकि माघ मेला क्षेत्र में 19 घाट बनाए गए थे पर माघी पूर्णिमा पर विदाई से पहले सभी की साध संगम स्नान की ही रही।
शिविर से संगम और वापस शिविर सहित मेले में जमकर खरीदारी भी की गई लेकिन घर पहुंचने के उत्साह ने जरा भी थकने नहीं दिया। संगम पर डुबकी के बाद भगवान विष्णु का पूजन और हवन के अतिरिक्त पितरों की प्रसन्नता के लिए तीर्थपुरोहितों को दान भी दिया गया। हालांकि अधिकतर कल्पवासियों ने कल्पवास के अनुष्ठान बृहस्पतिवार को ही पूरे कर लिए थे लेकिन जो बाकी रह गए थे, उन्होंने पूर्णिमा पर परंपरा के मुताबिक सत्यनारायण की कथा सुनी और तीर्थपुरोहितों की देखरेख में संगम तट, शिविर में हवन-पूजन भी किया।
घर वापसी पर कल्पवासी गंगाजली और रेणुका प्रसाद ले गए। वहीं गांव-घर, परिवार में प्रसाद बांटने के लिए सिंदूर, इलायची दाना, चुनरी आदि भी खरीदा गया। साथ आए बच्चों ने अपने लिए मनपसंद खिलौने, सजावटी सामान या जरूरत की अन्य चीजें खरीदीं। शिविर के बाहर बोई जौ और तुलसी का बिरवा पूजन-अर्चन के बाद संगम में विसर्जित कर दिया गया तो मान्यतानुसार कई कल्पवासी घर से लाया गया तुलसी का बिरवा फिर घर ले गए।