याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि एफआईआर 15 घंटे की देरी से दर्ज की गई थी और गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास है। जांच में कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर ही याची को दोषमुक्त किया गया था। वहीं, प्रतिवादी के अधिवक्ता ने दलील दी कि मृतका की पत्नी और अन्य चश्मदीद गवाहों ने ट्रायल के दौरान सीधे तौर पर जय नाथ प्रजापति की संलिप्तता और गोलीबारी में शामिल होने की बात कही।
कोर्ट ने कहा कि पति की हत्या के बाद पत्नी की मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी। इसलिए 15 घंटे की देरी उचित और स्वाभाविक है। ऐसे में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य का हवाला देते हुए कहा कि धारा-319 के तहत साक्ष्य का अर्थ मुकदमे के दौरान दर्ज किए गए बयानों से है, न कि केस डायरी या चार्जशीट की सामग्री से। गवाहों की ओर से जय नाथ का नाम विशेष रूप से लिए जाने के बाद उसे समन करने का ट्रायल कोर्ट का फैसला पूरी तरह कानूनी है।