काव्य-चेतना के अमर गायक डॉ.हरिवंश राय बच्चन की पुण्यतिथि पर सोमवार को नया कटरा स्थित ‘बसुधा’ भवन में आयोजित स्मृतिपर्व में उनका भावपूर्ण स्मरण किया गया। पं.देवीदत्त शुक्ल-पं.रमादत्त शुक्ल शोध संस्थान के सचिव व्रतशील शर्मा ने बच्चन जी, सरस्वती तथा मधुशाला की त्रिधारा के परिप्रेक्ष्य में कहा, उमर खय्याम की रुबाइयों की तर्ज पर बच्चन जी ने अंग्रेजी के अध्यापक होते हुए भी मधुशाला जैसी कालजयी रचना की। सबसे पहले इसका प्रकाशन दिसंबर 1933 में सरस्वती में ही हुआ था जिसमें संपादकों देवीदत्त शुक्ल एवं श्रीनाथ सिंह की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही।
कवि जयप्रकाश शर्मा ने कहा, बच्चन जी ने कविता के माध्यम से युवा-शक्ति- छात्रों को यह कहकर कि लोहा जब गर्म होता है, तभी लोहार के लिए उपयोगी होता है, समय का महत्व समझाया था। पूर्व वित्त अधिकारी अनुपम सिन्हा, समाजसेवी अशोक जैन, अरुण गुप्त, संदीप द्विवेदी ने उनकी रचनाओं के माध्यम से ही उन्हें याद किया। अतिथियों का स्वागत करते हुए अविनाश गुप्त ने कहा इस भवन जुड़ी साहित्यिक विरासत इसे साहित्य ऊर्जा से समृद्ध करती है। यह भवन बच्चन, पंत की साहित्य-साधना का साक्षी रहा। इसका नामकरण भी पंत जी ने किया था, बसुधा यानी बच्चन-सुमित्रानंदन धाम।
गोष्ठी में शामिल साहित्य प्रेमियों को स्मृति-फलक देकर सम्मानित किया गया। संदीप द्विवेदी ने मधुशाला का गायन करके आनंदित किया। संचालन वेदप्रकाश पाण्डेय और आभार ज्ञापन सूर्यप्रकाश केसरवानी ने किया। संगोष्ठी में प्राचार्य शालिनी गुप्ता, डा.आशुतोष प्रताप सिंह, छविपाल सिंह, ब्रजेश तिवारी, संतोष कुमार सिंह, विभूति द्विवेदी, सच्चिदानंद मिश्र आदि मौजूद थे।