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हाईकोर्ट : विभागीय जांच में दंडित कर हुई बर्खास्तगी मनमानी व सनक भरी, पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द

Fri, 12 Jan 2024 02:21 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

कोर्ट ने विभागीय जांच कार्यवाही में प्रक्रियात्मक दोष और बिना आरोप साबित किए बर्खास्त करने के दंड को मनमाना व सनक पूर्ण आदेश करार दिया है। साथ ही जारी कारण बताओ नोटिस, बर्खास्तगी आदेश व अपीलीय व पुनरीक्षण आदेशों को रद्द कर दिया है।
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अदालत। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीड़ित व एक मित्र चश्मदीद की सवा चार लाख की लूट की गवाही पर बिना दोषी करार दिए आरोपी पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। साथ ही विभागीय जांच रिपोर्ट पर विभाग को नियमानुसार कार्रवाई की छूट दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार ने केशव देव की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।

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कोर्ट ने विभागीय जांच कार्यवाही में प्रक्रियात्मक दोष और बिना आरोप साबित किए बर्खास्त करने के दंड को मनमाना व सनक पूर्ण आदेश करार दिया है। साथ ही जारी कारण बताओ नोटिस, बर्खास्तगी आदेश व अपीलीय व पुनरीक्षण आदेशों को रद्द कर दिया है।

याची अधिवक्ता का कहना था कि आरोपी याची के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर चले आपराधिक केस में कोर्ट ने सबूतों के अभाव में बरी कर दिया और उसी एफआईआर के आधार पर आरोपित कर विभागीय जांच में केवल पीड़ित व मित्र की गवाही पर लूट का जिम्मेदार मानते हुए सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
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मामले में कन्हैयालाल मिश्र ने घटना के पांच दिन बाद याची पर उसकी जेब से सवा चार लाख छीन लेने के आरोप में 17 दिसंबर 2016 को एफआईआर दर्ज कराई। वारदात के समय मित्र गोपाल शर्मा मौजूद था।
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विभागीय जांच अधिकारी ने दोनों के बयान व दर्ज एफआईआर के आधार पर याची को कारण बताओ नोटिस दी। इसके बाद याची के जवाब को संतोषजनक नहीं माना गया और उसे बर्खास्त कर दिया गया। सजा के खिलाफ अपील खारिज कर दी गई। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

याची का कहना था कि आपराधिक केस में कोर्ट ने 31 जुलाई 23 को उसे बरी कर दिया और कन्हैया लाल के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा। इसलिए विभागीय कार्रवाई के लिए फैसले का इंतजार करना चाहिए था। सरकारी वकील ने विरोध किया कहा कि आपराधिक केस में बरी होने से विभागीय जांच में स्वत: मुक्त नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को कारण बताओ नोटिस का अधिकार नहीं। आरोप साबित हुए बगैर दंडित कर दिया गया। बर्खास्तगी मनमानी व सनक भरा आदेश है। यदि इसे कायम रखा गया तो न्याय की भ्रूण हत्या के समान होगा।
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