विभागीय जांच अधिकारी ने दोनों के बयान व दर्ज एफआईआर के आधार पर याची को कारण बताओ नोटिस दी। इसके बाद याची के जवाब को संतोषजनक नहीं माना गया और उसे बर्खास्त कर दिया गया। सजा के खिलाफ अपील खारिज कर दी गई। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
याची का कहना था कि आपराधिक केस में कोर्ट ने 31 जुलाई 23 को उसे बरी कर दिया और कन्हैया लाल के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा। इसलिए विभागीय कार्रवाई के लिए फैसले का इंतजार करना चाहिए था। सरकारी वकील ने विरोध किया कहा कि आपराधिक केस में बरी होने से विभागीय जांच में स्वत: मुक्त नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी को कारण बताओ नोटिस का अधिकार नहीं। आरोप साबित हुए बगैर दंडित कर दिया गया। बर्खास्तगी मनमानी व सनक भरा आदेश है। यदि इसे कायम रखा गया तो न्याय की भ्रूण हत्या के समान होगा।