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हमेशा सवालों के घेरे में रही है कचहरी की सुरक्षा

Sun, 18 Mar 2018 01:46 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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बम - फोटो : file photo
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जिला न्यायालय के पास अधिवक्ता भवन में बृहस्पतिवार को हुए धमाके ने एक बार फिर जिला कचहरी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। कचहरी की सुरक्षा पहले भी सवालों में रही हैं। कई बड़ी वारदातें होने के बावजूद यहां की सुरक्षा कभी भी प्राथमिकता पर नहीं रही बावजूद इसके कचहरी परिसर से ही सटा जिलाधिकारी कार्यालय और ठीक सामने एसएसपी का दफ्तर है।
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नौ मार्च 2015 को कचहरी परिसर के भीतर ही अधिवक्ता नबी अहमद और दरोगा के बीच हुए विवाद के बाद नबी की हत्या से कचहरी दहल उठी थी। जमकर आगजनी और तोड़फोड़ हुई। फायरिंग भी हुई जिसमें एक पुलिसकर्मी गोली लगने से घायल हुआ था। इसके बाद से ही कचहरी परिसर में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की कवायद शुरू हो गई। मगर मामला ठंडा पहले के साथ ही सुरक्षा का मुद्दा भी ढीला पड़ गया।
सात जजों की पीठ में उठा मुद्दा
नबी हत्याकांड के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड की अध्यक्षता में हाईकोर्ट के सात वरिष्ठ जजों की पीठ ने सुरक्षा का मामला अपने हाथों में लिया था। वृहद पीठ के आदेश से ही इलाहाबाद सहित प्रदेश की सभी जिला अदालतों में सीसीटीवी कैमरे लगाने, हथियार लेकर प्रवेश पर रोक, जिला अदालतों की सुरक्षा बढ़ाने और अलग बिजली का फीडर देने जैसे कई आदेश पारित किए गए। इसके बाद ही कचहरी में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए।
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जिला न्यायालय में अक्सर बड़े माफिया या जेलों में बंद नेताओं की पेशी होती है। जब भी यह लोग पेशी पर आते हैं इनसे मिलने बड़ी संख्या में समर्थक आते हैं। समर्थकों की भीड़ गई बार इतनी अधिक होती है कि इन पर काबू पाने में पुलिस के पसीने छूट जाते हैं। इस भीड़ का फायदा उठाकर कभी भी कोई गंभीर वारदात को अंजाम दे सकता है। अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष शीतला प्रसाद मिश्र बताते हैं समर्थकों को रोकने के लिए कई बार जिला प्रशासन और न्यायालय प्रशासन का ध्यान इस ओर दिलाया गया है।

पूर्व अध्यक्ष शीतला मिश्र कहते हैं कचहरी परिसर में आने-जाने के कई गेट हैं। इनमें किसी के प्रवेश के समय जांच नहीं होती है जैसा की हाईकोर्ट में होता है। इसका फायदा उठाकर कोई भी व्यक्ति असलहा छिपा कर भीतर जा सकता है। इसलिए परिसर मेें प्रवेश के समय जांच होनी चाहिए।
कैदियों के भागने की भी घटनाएं
जेल से पेशी पर लाए गए कैदियों के भाग निकलने की घटनाएं भी सुरक्षा में चूक की वजह से ही है। साल भर के दौरान बंदियों के भागने की कई घटनाएं होती हैं। हालांकि वीडियो कांफ्रेंसिंग से पेशी की शुरूआत होने के बाद इस प्रकार की घटनाओं में कमी आई है।

संत ज्ञानेश्वर हत्याकांड मेें आरोपी विधायक सोनू सिंह ओर मोनू सिंह पर कचहरी परिसर में ही बम से हमला हो चुका है। हालांकि इस हमले में वह बाल-बाल बच निकले थे। हमला करने का आरोप संत ज्ञानेश्वर के शिष्यों पर लगा था।
अतीक पर हो चुका है बम से हमला
कचहरी में पेशी के दौरान पूर्व सांसद अतीक अहमद पर भी चार अगस्त 2013 को बम से हमला हो चुका है। इस हमले में वह बाल-बाल बच गए थे। हमलावर एकलाख मौके से पकड़ा गया था। हमलावर बंदियों पर जानलेवा हमले और हत्या की और वारदातें भी कचहरी परिसर में हो चुकी हैं। इनमें सब से ज्यादा घटनाएं पेशी पर आए लोगों के साथ ही हुई हैं।

कचहरी परिसर में नब्बे के दशक में पेशी पर आए अभियुक्त अख्तर को दिन दहाड़े गोलियों से छलनी कर दिया गया था। हमलावर एक मारुति वैन से आए थे और गोली मारने के बाद भागने के फिराक मेें थे मगर एक पुलिस सिपाही ने बहादुरी दिखाते हुए उनको घेर लिया और वैन के भीतर ही पांच लोगों को अपनी राइफल से ढेर कर दिया था।
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