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High Court : पहली पत्नी के रहते विभागीय अनुमति बिना दूसरी शादी करना कदाचार, सीआरपीएफ सिपाही की बर्खास्तगी सही

Sun, 16 Aug 2026 06:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी के जीवित रहते बिना विभागीय अनुमति दूसरी शादी करना सीआरपीएफ के नियमों का उल्लंघन है। इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पहली पत्नी के जीवित रहते बिना विभागीय अनुमति दूसरी शादी करना सीआरपीएफ के नियमों का उल्लंघन है। इसे गंभीर कदाचार माना जाएगा। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने पहली पत्नी को तलाक दिए बिना और विभाग के बिना अनुमति दूसरी शादी करने वाले सीआरपीएफ कांस्टेबल की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी।

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यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने दिया है। याची ने वर्ष 1976 में उर्मिला देवी से शादी की थी। वर्ष 1988 में सीआरपीएफ में कांस्टेबल के पद पर नियुक्त हुआ। उसका कहना था कि वर्ष 1989 में उसकी पहली पत्नी बच्चों के साथ घर छोड़कर चली गई। काफी तलाश के बावजूद नहीं मिली। इसके बाद वर्ष 1992 में उसने प्रतिमा देवी से दूसरी शादी कर ली।

दूसरी शादी के लिए उसने विभाग से कोई अनुमति नहीं ली और न ही विभाग को इसकी जानकारी दी। विभागीय जांच के बाद 8 जुलाई 2011 को विभागीय प्राधिकारी ने उसे सीआरपीएफ अधिनियम के उल्लंघन में उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया। इसे उसने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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याची अधिवक्ता की दलीलें खारिज

याची अधिवक्ता ने दलील दी गई कि उसने दूसरी पत्नी का नाम सेवा रिकॉर्ड में नॉमिनी के तौर पर दर्ज कराया था। इसे विभाग को सूचना देने के रूप में माना जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि दूसरी शादी का आरोप साबित होने की स्थिति में भी बर्खास्तगी के बजाय मामूली सजा दी जानी चाहिए थी। हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि सीआरपीएफ नियम 15 के तहत पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करने पर रोक है। व्यक्तिगत कानून में दूसरी शादी की अनुमति होने की स्थिति में भी विभाग की पूर्व अनुमति जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि पहली शादी कायम रहते बिना तलाक दूसरी शादी की गई है। कोर्ट के अनुसार, इससे सीआरपीएफ नियम 15 और केंद्रीय सिविल सेवा आचरण नियमों के नियम 21 का उल्लंघन हुआ। कोर्ट ने कहा कि याची की ओर से की गई दूसरी शादी सीआरपीएफ नियमों के तहत कदाचार है और बर्खास्तगी की सजा वैध है।
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