कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिवाकर द्विवेदी के केस में दिए गए निर्णय सभी न्यायिक अधिकारियों पर लागू होंगे। किराये का दावा न्यायिक अधिकारी जिला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। जिला न्यायाधीश उसकी पुष्टि कर महानिबंधक को भेज देंगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के न्यायिक अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे अपने बकाए किराये का दावा जिला जजों के माध्यम से करें। इसके लिए वह न्यायिक कार्यवाही का सहारा न लें। कोर्ट ने कहा कि यह न्याय व न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के हित में नहीं होगा कि न्यायिक अधिकारियों को अपनी शिकायत के निवारण के लिए ऐसे मामलों में न्यायिक कार्यवाही का सहारा लेना पड़े। खासकर किराए के बकाये के लिए। यह आदेश न्यायमूर्ति सुनीत कुमार व न्यायमूर्ति राजेंद्र कुमार चतुर्थ ने इलाहाबाद की जिला अदालत में तैनात याची न्यायिक मजिस्ट्रेट मानस वत्स की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।
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कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिवाकर द्विवेदी के केस में दिए गए निर्णय सभी न्यायिक अधिकारियों पर लागू होंगे। किराये का दावा न्यायिक अधिकारी जिला न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। जिला न्यायाधीश उसकी पुष्टि कर महानिबंधक को भेज देंगे। महानिबंधक उसे प्रधान सचिव यूपी सरकार के समक्ष भेजकर दावे का भुगतान सुनिश्चित कराएंगे।
मामले में न्यायिक अधिकारी ने याचिका दायर कर एक वर्ष से अधिक समय तक (27 मई 2021 से चार अगस्त 2022 तक) किराये के आवास पर रहने के दौरान किराया मय ब्याज के भुगतान के लिए निर्देश देने की मांग की थी। न्यायिक अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिवाकर द्विवेदी बनाम यूपी राज्य के मामले में दिए गए आदेश का हवाला भी दिया। कहा कि उन्हें बतौर किराया दो लाख, 88 हजार, 680 रुपये एरियर ब्याज सहित दिया जाए। इसके बाद कोर्ट ने यह निर्देश न्यायिक अधिकारियों के लिए जारी किया।