इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विकास प्राधिकरण ने अधिग्रहीत की गई जमीन का मुआवजा खातेदार के रूप में दर्ज लोगों को 2017 में ही दे दिया है। ऐसे में भूमि हस्तांतरित करने वाले किसानों को दोबारा मुआवजा देने का निर्देश नहीं दे सकते। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली व न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने खेमचंद व एक अन्य की जनहित याचिका पर दिया।
गाजियाबाद के याची ने कहा कि राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम की ओर से जमीन के अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद मुआवजा लेने वाले लोगों ने जमीन खरीदी थी, जबकि अधिसूचना के बाद जमीन की खरीद-फरोख्त नहीं की जा सकती। ऐसे में प्रतिवादी प्राधिकारियों को अनधिकृत व्यक्तियों से मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया जाए।
न्यायालय ने कहा कि 2017 में अनधिकृत रूप से जमीन खरीदने के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया गया था, लेकिन उक्त मुकदमे में क्या हुआ रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है। सात साल बाद 2024 में याचिका दायर की गई है। न्यायालय ने यह भी कहा कि जिन किसानों ने जमीन हस्तांतरित की थी, वह आगे नहीं आए हैं, ऐसे में याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।