जिला अदालत ने न्यायालय परिसर में वादकारियों से मारपीट करने के आरोपी अधिवक्ता जमानत अर्जी खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की। कहा कि वकील विधि के शासन का संस्थापक और वादकारी का भविष्य निर्माता होता है। समाज के पहले पायदान पर खड़े वकील से न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप की उम्मीद नहीं की जा सकती। वादकारी से दुर्व्यवहार करने वाले वकील जमानत के हकदार नहीं हो सकते।
यह टिप्पणी अपर सत्र न्यायाधीश डाॅ. दिनेश चंद्र शुक्ला की अदालत ने जिला कचहरी के अधिवक्ता रणविजय सिंह की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए की। मामला प्रयागराज के कर्नलगंज थाना क्षेत्र का है। पीड़ित वादी मो अबरार ने आरोपी रणविजय सिंह समेत चार नामजद और चार अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। आरोप लगाया कि जिला न्यायालय में वह और सोनू उर्फ अली अहमद अपने वकील से मिलने उसके चैंबर में पहुंचे थे। इसी दौरान अधिवक्ता रणविजय अपने साथियों के साथ पहुंचे और गाली देते हुए मारपीट करने लगे। जमीन से जुड़े कागजात और तीन हजार रुपये छीन कर धमकी देते हुए भाग गए।
जबकि, आरोपी के अधिवक्ता की दलील थी कि अधिवक्ता बीस साल से विधि व्यवसाय कर रहा है। राजनैतिक विद्वेष की वजह से उसे फंसाया गया है। कोई स्वतंत्र साक्षी नहीं है। जमानत याचिका का विरोध करते हुए एडीजीसी सुशील वैश्य ने दलील दी कि आरोपी वकील के खिलाफ 12 मामलों का आपराधिक इतिहास है। इससे पहले भी वादकारियों से मारपीट के अन्य मामले में आरोपी को जिला अधिवक्ता संघ ने निष्कासित कर दिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने आपराधिक अवमानना की कार्यवाही के तहत न्यायालय परिसर में प्रवेश पर रोक लगा रखी है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियों के साथ आरोपी वकील की जमानत खारिज कर दी।