हाईकोर्ट में वैसे से मुकदमों की बहस से लेकर फैसलों को लिखाने तक में अंग्रेजी की ही प्रमुखता है मगर हाल के कई वर्षों में हिंदी में बहस करने का चलन बढ़ा है और अदालतों में इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है। हिंदी में बहस करने वाले वकीलों पर भी न्यायमूर्ति पूरी तव्वजौ देते हैं। इससे हिंदी में काम करने वाले वकीलों का उत्साह भी बढ़ता है।
हालांकि हिंदी में चार दशक से ज्यादा समय से काम कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दयाशंकर मिश्र कहते हैं कि न्यायपालिका में हिंदी की स्थिति अभी और बेहतर करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार के स्तर से प्रयास होना चाहिए। पहले सरकार विधि पर कई किताबें हिंदी में छापती थी मगर अब सरकारी प्रकाशनों से छपाई नहीं हो रही है।
अनुवादकों की है कमी
अंग्रेजी में लॉ जर्नल छापने वाले एक चर्चित प्रकाशक का मानना है कि हिंदी के फैसलों का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हो पाता है। इसकी वजह है कि यह प्रक्रिया काफी दिक्कत भरी है और हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले नहीं मिल पाते हैं। हिंदी में कई चर्चित विषयों पर विधि पुस्तकें लिख मो. हसन जैदी बताते हैं कि हिंदी में काम काज बढ़ा है। पहले विधि के कई तकनीकी विषयों जैसे फोरेंसिंक साइस और साइबर लॉ पर सिर्फ अंग्रेजी में ही किताबें उपलब्ध होती थी।
इनमें से ज्यादातर विदेशी प्रकाशनों की होती जो काफी महंगी थी। अब ऐसे तकनीकी विषयों पर भी हिंदी में किताबें उपलब्ध हैं। इससे हिंदी भाषी राज्यों के वकीलों को काफी सहूलियत हुई है। तकनीकी शब्दावली की जो दिक्कतें वह भी हिंदी में दूर की जा रही हैं क्योंकि हिंदी ने बहुत से तकनीकी शब्दों को उनके मौलिक रूप में अपना लिया है।