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हिंदी हैं हम: मुहिम ला रही रंग, न्याय क्षेत्र में धीरे-धीरे बढ़ रहे हिंदी के कदम, अभी फैसलों का अंग्रेजी में नहीं होता अनुवाद

Thu, 02 Sep 2021 02:52 PM IST
प्राची प्रियम योगेन्द्र मिश्र, प्रयागराज

सार

हाल के कई वर्षों में हिंदी में बहस करने का चलन बढ़ा है और अदालतों में इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है। हिंदी में बहस करने वाले वकीलों पर भी न्यायमूर्ति पूरी तव्वजौ देते हैं। इससे हिंदी में काम करने वाले वकीलों का उत्साह भी बढ़ता है।
 
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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अदालतों के फैसले आम आदमी की भाषा में उस तक पहुंचाने की मुहिम अब रंग दिखाने लगी है। जिला अदालत से लेकर उच्च न्यायालय तक हिंदी अपनी पहुंच बढ़ा रही है। मगर हिंदी-अंग्रेजी का फासला फिर भी बरकरार है। विधि पत्रकाओं में अंग्रेजी से अनुवाद कर हिंदी में फैसले छापने का चलन तो पुराना है अब हिंदी में दिए जा रहे फैसलों को अब भी अंग्रेजी लॉ जर्नल में स्थान नहीं मिल पा रहा है। जानकार इसमें कई दिक्कतें बताते हैं तो हिंदी की सेवा कर रहे वकीलों का कहना है कि इसमें सरकार के स्तर से प्रयास और मदद किए जाने की जरूरत है।

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हालांकि इस विसंगति के बावजूद हाईकोर्ट के फैसले हिंदी में धड़ल्ले से दिए जा रहे हैं तो इसका श्रेय उन जजों को जाता है जो अंग्रेजी के साथ ही अनिवार्य रूप से हिंदी में भी फैसले सुना रहे हैं। यह बदलाव इस बात की उम्मीद दिलाता है कि अंग्रेजी के वर्चस्व वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में आने वाले दिनों में हिंदी का प्रभुत्व और बढ़ेगा और आम लोगों को और ज्यादा फैसले उसकी अपनी भाषा में उपलब्ध होंगे।

हाल के दिनों में न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी और न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने हिंदी में कई अहम फैसले दिए हैं । आम तौर पर ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों को लॉ जर्नल में छापा जाता है। मगर दुर्भाग्य से अंग्रेजी में छपने वाले जर्नल में ऐसे फैसलों को जगह नहीं मिल पा रही है। 
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न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी का जमानतों पर हिंदी में दिया गया निर्णय काफी चर्चित रहा। इसी प्रकार से न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने हाल में शादी के लिए धर्मांतरण करने को लेकर चर्चित फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति यादव अब तक सौ से अधिक फैसले हिंदी में दे चुके हैं। हाल ही में हाईकोर्ट में हिंदी पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने वकीलों से वादा किया कि कम से कम पच्चीस फीसदी फैसले हिंदी में जरूर देंगे।

हाईकोर्ट में हिंदी में फैसले देने का चलन नया नहीं है। दरअसल इसकी शुरूआत काफी पहले ही हो गई थी। स्व. न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त, न्यायमूर्ति शंभूनाथ श्रीवास्तव, न्यायमूर्ति शशिकांत, न्यायमूर्ति अशोक कुमार सरीखे तमाम जजों ने हिंदी में सैकड़ों फैसले दिए हैं। मगर सबके सामने कठिनाई यही रही कि हाईकोर्ट में काम काज की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी ही होने के कारण हिंदी के स्टेनो की काफी कमी है। 

कई जजों के पास हिंदी में फैसले टाइप करने वाले एक भी स्टेनों नहीं हैं। मांग करने पर बमुश्किल एक दो स्टेनों ही हिंदी वाले मिल पाते हैं। हाईकोर्ट के जजों को हर दिन सैकड़ों मुकदमों में फैसले देने होते हैं जिसके लिए प्रत्येक जज को तीन से चार स्टेनों की जरूरत होती है। चूंकि इनमें हिंदी में टाइपिंग करने वाले एक दो स्टेनों ही होते हैं इसलिए अंग्रेजी में फैसला देना कई विवशता भी होती है।

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वकीलों की बहस में शामिल होती है हिंदी

हाईकोर्ट में वैसे से मुकदमों की बहस से लेकर फैसलों को लिखाने तक में अंग्रेजी की ही प्रमुखता है मगर हाल के कई वर्षों में हिंदी में बहस करने का चलन बढ़ा है और अदालतों में इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है। हिंदी में बहस करने वाले वकीलों पर भी न्यायमूर्ति पूरी तव्वजौ देते हैं। इससे हिंदी में काम करने वाले वकीलों का उत्साह भी बढ़ता है।

हालांकि हिंदी में चार दशक से ज्यादा समय से काम कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दयाशंकर मिश्र कहते हैं कि न्यायपालिका में हिंदी की स्थिति अभी और बेहतर करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार के स्तर से प्रयास होना चाहिए। पहले सरकार विधि पर कई किताबें हिंदी में छापती थी मगर अब सरकारी प्रकाशनों से छपाई नहीं हो रही है।

अनुवादकों की है कमी
अंग्रेजी में लॉ जर्नल छापने वाले एक चर्चित प्रकाशक का मानना है कि हिंदी के फैसलों का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हो पाता है। इसकी वजह है कि यह प्रक्रिया काफी दिक्कत भरी है और हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले नहीं मिल पाते हैं। हिंदी में कई चर्चित विषयों पर विधि पुस्तकें लिख मो. हसन जैदी बताते हैं कि हिंदी में काम काज बढ़ा है। पहले विधि के कई तकनीकी विषयों जैसे फोरेंसिंक साइस और साइबर लॉ पर सिर्फ अंग्रेजी में ही किताबें उपलब्ध होती थी। 

इनमें से ज्यादातर विदेशी प्रकाशनों की होती जो काफी महंगी थी। अब ऐसे तकनीकी विषयों पर भी हिंदी में किताबें उपलब्ध हैं। इससे हिंदी भाषी राज्यों के वकीलों को काफी सहूलियत हुई है। तकनीकी शब्दावली की जो दिक्कतें वह भी हिंदी में दूर की जा रही हैं क्योंकि हिंदी ने बहुत से तकनीकी शब्दों को उनके मौलिक रूप में अपना लिया है।
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