याची का कहना था कि प्रोफेसर हजेला गोल्ड मेडल के लिए चयनित छात्र से उसे अधिक अंक प्राप्त हुए हैं, इसके बावजूद चयन समिति ने उसका चयन न करके उससे कम अंक पाने वाले छात्र का चयन मेडल देने के लिए किया है। इस पर कोर्ट ने विश्वविद्यालय से पूछा था कि मेडल देने के लिए क्या कोई गाइड लाइन का पालन किया जाता है। सूची तैयार करने का क्या आधार है। विश्वविद्यालय की ओर से इसका कोई माक़ूल जवाब नहीं दिया जा सका। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता का कहना था कि ऐसी कोई गाइड लाइन नहीं है। परीक्षा समिति इस पर निर्णय लेती है। कोर्ट ने परीक्षा समिति को वैधानिक संस्था नहीं माना।
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता अमरेंद्रनाथ सिंह ने कहा कि संस्कृत और दर्शनशास्त्र में पिछले सेमेस्टर के पूरे अंक जोड़े गए हैं, जबकि अर्थशास्त्र में मात्र 10 प्रतिशत अंक जोड़कर ही अगले सेमेस्टर में प्रोन्नति दी गई, जो कि दोष पूर्ण है। हालांकि विश्वविद्यालय संस्कृत और दर्शनशास्त्र में अपनाए गए तरीक़े पर भी स्पष्टीकरण नहीं दे पाया।