कोर्ट ने कहा कि याचिका में देरी की वजह याची की ओर से बरती गई लापरवाही नजर आती है। इस वजह से देरी की माफी को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। मामले में याची की ओर से मिर्जापुर परिवार न्यायालय के न्यायाधीश के फैसले को चुनौती दी गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मियाद (समयावधि) का कानून पक्षकारों के हितों को नष्ट करने के लिए नहीं है। पक्षकारों को लंबी रणनीति का सहारा न लेते हुए उन्हें अपने अधिकारों के लिए सोना नहीं चाहिए। उन्हें उपचार प्राप्त करने के लिए तुरंत उपाय तलाशने चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने मिर्जापुर निवासी लक्ष्मण प्रसाद की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
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कोर्ट ने कहा कि याचिका में देरी की वजह याची की ओर से बरती गई लापरवाही नजर आती है। इस वजह से देरी की माफी को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। मामले में याची की ओर से मिर्जापुर परिवार न्यायालय के न्यायाधीश के फैसले को चुनौती दी गई थी। परिवार न्यायालय मिर्जापुर ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत 2015 में पत्नी को भरण-पोषण भत्ता देने का आदेश दिया था।
आदेश के मुताबिक याची को पांच हजार रुपये प्रतिमाह और शेष धनराशि को एक वर्ष के भीतर हर तीन महीने में चार समान किस्तों में भुगतान करना था। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने कहा कि याची की ओर से मियाद अधिनियम 1963 की धारा पांच के तहत दाखिल विलंब माफी आवेदन स्वीकार योग्य नहीं है।