काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद विवाद मामले में मंगलवार को भी सुनवाई जारी रही। मंदिर का पक्ष रखते हुए न्यायमित्र एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने तर्क दिया कि भगवान विश्वेश्वर प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं। अर्थात, सतयुग से अब तक। कहा गया कि मंदिर तो नष्ट किया गया, लेकिन इसके धार्मिक स्वरूप के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई। इसके धार्मिक स्वरूप को बरकरार रखा गया।
इसलिए पूजा के स्थानों (विशेष प्रावधान अधिनियम 1991) की धारा चार लागू नहीं होती। तर्क दिया कि विश्वेश्वर मंदिर की संरचना 15वीं शताब्दी से पहले की है। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद वाराणसी सहित पांच याचिकाओं पर न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।
न्यायमित्र की ओर से कहा गया कि वक्फ अधिनियम में संपत्ति का पंजीकरण मात्र उस व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित नहीं करता है, जो मुस्लिम नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम केवल मुसलमानों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों में लागू होता है और इसलिए भले ही विवादित संरचना प्रश्नगत संपत्ति वक्फ अधिनियम के तहत पंजीकृत है। लेकिन इसका हिंदुओं के दावे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
क्योंकि, हिंदुओं का उक्त संपत्ति पर भगवान विश्वेश्वर का मंदिर होने का अधिकार है। तर्क दिया कि मुस्लिम पक्ष की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किस अधिनियम के तहत और किस वर्ष में विवादित संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत किया गया था।
इस मामले में न्यायालय के समक्ष कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। उन्होंने तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम 1954 कभी भी यूपी राज्य में लागू नहीं हुआ था। समय की कमी की वजह से मामले की सुनवाई के लिए 28 अप्रैल की तिथि तय कर दी गयी।