याची के विरुद्ध उसके पति और ससुराल वालों ने बिना तलाक लिए दूसरा विवाह करने का आरोप लगाया था। वाराणसी जिला अदालत ने परिवाद का संज्ञान लेते हुए याची के विरुद्ध सम्मन जारी कर अदालत में पेश होने का आदेश दिया था। याची ने सम्मन और परिवाद को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याची का कहना था कि उसका विवाह पांच जून 2017 को सत्यम सिंह के साथ हुआ था। कुछ समय बाद दोनों में आपसी मतभेद पैदा हो गए। इस कारण याची ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न व मारपीट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया। आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया। इस मामले में पुलिस पति व ससुराल वालों के खिलाफ विचारण न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।
याची ने दलील दी कि पति द्वारा दाखिल परिवाद में विवाह समारोह संपन्न होने का कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। न हीं सप्तपदी का कोई साक्ष्य है, जो हिंदू विवाह की अनिवार्य रस्म है। एकमात्र साक्ष्य के तौर पर फोटोग्राफ लगाया गया है, जिसमें लड़की का चेहरा स्पष्ट नहीं है। दूसरे विवाह का आरोप सरासर गलत है। यह आरोप याची की ओर से दर्ज कराए गए दहेज उत्पीड़न के मुकदमे का बदला लेने की नीयत से लगाया गया है।
गौरतलब है कि याची के पति और ससुराल वालों ने पुलिस अधिकारियों को एक शिकायती पत्र देकर आरोप लगाया था कि पहले पति से तलाक लिए बिना याची ने दूसरी शादी रचा ली है। सीओ सदर मिर्जापुर ने मामले जांच की तो शिकायत झूठी निकली। इसके बाद पति सत्यम सिंह ने वाराणसी के जिला न्यायालय में परिवाद दाखिल कर दिया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह की वैधता को स्थापित करने के लिए सप्तपदी एक अनिवार्य तत्व है। वर्तमान मामले में इसका कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। यह स्पष्ट है कि सिर्फ याची को परेशान करने के उद्देश्य से दूषित न्यायिक प्रक्रिया शुरू की गई है, जो अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। अदालत का यह दायित्व है कि वह निर्दोष लोगों को ऐसी प्रक्रिया से बचाए। कोर्ट ने वाराणसी की अदालत द्वारा 21 अप्रैल 2022 को याची के विरुद्ध जारी सम्मन और परिवाद की कार्यवाही को रद्द कर दिया है।