मौजूदा मामले में शिकायतकर्ता उन गवाहों में से एक है, जिसका बयान 15 अप्रैल, 2022 को लिखी गई प्राथमिकी में सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पुलिस द्वारा दर्ज किया गया था। याचिकाकर्ताओं के वकील ने अपनी दलील में कहा कि दोनों ही प्राथमिकियों में एक या दो व्यक्तियों को छोड़कर आरोपी समान ही हैं और दोनों मामलों में शिकायतकर्ता अलग-अलग हैं। उन्होंने कहा कि दोनों ही मामलों में धोखाधड़ी और लालच देकर सामूहिक धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया गया है, इन तथ्यों को देखते हुए उक्त प्राथमिकी सीआरपीसी की धारा 154 और 158 के तहत वर्जित है।
न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति गजेंद्र कुमार की पीठ ने कहा कि हालांकि, दूसरी प्राथमिकी उसी घटना से संबंधित है, लेकिन इसे इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता। क्योंकि, इसे एक सक्षम व्यक्ति द्वारा दर्ज कराया गया है। अदालत ने कहा, “चूंकि 15 अप्रैल, 2022 की प्राथमिकी एक सक्षम व्यक्ति द्वारा दर्ज नहीं कराई गई थी, इसलिए इसका कोई महत्व नहीं है। समान कारण के लिए मौजूदा प्राथमिकी को दूसरी प्राथमिकी नहीं कहा जा सकता। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि समान घटना की दो अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।” अदालत ने कहा, प्राथमिकी में लगाए गए आरोप में एक संज्ञेय अपराध शामिल है। इसलिए यह प्राथमिकी रद्द किए जाने योग्य नहीं है। इन कारणों को देखते हुए इस रिट याचिका को खारिज किया जाता है।