विवेचना के दौरान दर्ज पीड़िता के बयान के आधार पर याची का नाम पूरक आरोप पत्र में शामिल कर दिया गया। कोर्ट ने वर्ष 2020 में आरोप पत्र पर संज्ञान भी ले लिया। मामला दर्ज होने के 15 साल बाद अभियोजन की ओर से वर्ष 2021 में नई अर्जी देते हुए याची के खिलाफ दुष्कर्म की धाराएं बढ़ाते हुए आरोप सृजन की मांग की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।
याची ने दुष्कर्म के आरोप सृजन की स्वीकृति को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याची की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दया शंकर मिश्रा ने दलील पेश करते हुए अभियोजन की अर्जी की पोषणीयता पर सवाल खड़े करने के साथ ही पीड़िता के बयान की शुद्धता और वैधता पर आपत्ति जताई। कहा कि पीड़िता का बयान विवेचनाधिकारी की जगह महिला आरक्षी द्वारा दर्ज किया गया, जो विधि विरूद्ध है।
पीड़िता के बयान के अलावा दुष्कर्म का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। जबकि राज्य सरकार के वकील ने निचली अदालत के आदेश को विधि सम्मत बताया, कहा कि विवेचना के दौरान दुष्कर्म पीड़िता का बयान विवेचक के निर्देश पर महिला पुलिस द्वारा दर्ज किया जाना गलत नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि विवेचना के दौरान दर्ज गवाहों के बयान की शुद्धता और वैधता की जांच ट्रायल के दौरान होगी, जिसका क्षेत्राधिकार ट्रायल कोर्ट को है। हाईकोर्ट इस स्तर पर गवाहों के बयान की शुद्धता और वैधता की जांच के लिए अपनी अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकती।